आदित्य हृदय स्तोत्र अर्थसहित

आदित्य हृदय स्तोत्र अर्थसहित

किसी भी स्तोत्र का अर्थ जानकर पढ़ने से वह अधिक फलदायी माना जाता है और पढ़ते समय मन भी स्तोत्र में रमने लगता है। तो आइये, सुगम ज्ञान संगम के अध्यात्म + स्तोत्र संग्रह स्तम्भ में आदित्य हृदय स्तोत्र का हिन्दी में अर्थ जानते हैं।

यह स्तोत्र पढ़ने से पूर्व विनियोग और गायत्री मन्त्र का पाठ करना आवश्यक माना जाता है, अतः जब कभी साधक इस स्तोत्र का पाठ करेें तो पाठ के पूर्व विनियोग एवं गायत्री मन्त्र अवश्य पढ़ें।

विनियोग
ॐ अस्य आदित्यहृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुप् छन्दः, आदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।

गायत्री मन्त्र
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

❀ आदित्य हृदय स्तोत्रम् ❀

❍ ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌।।१।।
❑अर्थ➠ उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया।

❍ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा।।२।।
❑अर्थ➠ यह देखकर भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।

❍ राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्‌।
येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे।।३।।
❑अर्थ➠ सबके हृदय में रमण करनेवाले महाबाहो राम! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।

❍ आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌।।४।।
❑अर्थ➠ इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करनेवाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है।

❍ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌।।५।।
❑अर्थ➠ सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु का बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

❍ रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌।।६।।
❑अर्थ➠ भगवान् सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं। ये नित्य उदय होनेवाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करनेवाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका [रश्मिमन्ते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम-मन्त्रों द्वारा] पूजन करो।

❍ सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन:।
एष देवासुरगणाँल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि:।।७।।
❑अर्थ➠ सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत् को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करनेवाले हैं। ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरोंसहित समस्त लोकों का पालन करते हैं।

❍ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति:।
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः।।८।।
❑अर्थ➠ ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण हैं।

❍ पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु:।
वायुर्वह्निः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर:।।९।।
❑अर्थ➠ पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करनेवाले तथा प्रकाश के पुञ्ज हैं।

❍ आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर:।।१०।।
❑अर्थ➠ इनके नाम हैं आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत् को उत्पन्न करनेवाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरण करनेवाले), पूषा (पोषण करनेवाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य (सुवर्ण के समान), भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्मांड कि उत्पत्ति के बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले),

❍ हरिदश्व: सहस्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌।
तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌।।११।।
❑अर्थ➠ हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक/हरे रंग के घोड़ेवाले), सहस्रार्चि (हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति (सात घोड़ोंवाले), मरीचिमान् (किरणों से सुशोभित), तिमिरोमन्थन (अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू (कल्याण के उद्गम स्थान), त्वष्टा (भक्तों का दुःख दूर करनेवाले/जगत् का संहार करनेवाले), मार्तण्डक (ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने वाले), अंशुमान् (किरणों को धारण करनेवाले)

❍ हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि:।
अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशन:।।१२।।
❑अर्थ➠ हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से ही सुख प्रदान करनेवाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर (दिनकर), रवि (स्तुति के पात), अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करनेवाले), अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले)

❍ व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग:।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः।।१३।।
❑अर्थ➠ व्योमनाथ (आकाश के स्वामी), तमोभेदी (अन्धकार का भेदन करनेवाले), ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टि के कारण), अपां मित्र (जल को उत्पन्न करनेवाले), विन्ध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलनेवाले)

❍ आतपी मण्डली मृत्यु: पिङ्गल: सर्वतापन:।
कविर्विश्वो महातेजा रक्त: सर्वभवोद्भव:।।१४।।
❑अर्थ➠ आतपी (धूप उत्पन्न करनेवाले), मंडली (किरण समूह को उत्पन्न करनेवाले), मृत्यु (मौत के कारण), पिंगल (भूरे रंगवाले), सर्वतापन (सबको ताप देनेवाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण)

❍ नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन:।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते।।१५।।
❑अर्थ➠ नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करनेवाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी और द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त हैं) । इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव! आपको नमस्कार है।

❍ नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम:।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम:।।१६।।
❑अर्थ➠ पूर्वगिरी-उदयाचल तथा पश्चिमगिरी-अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।

❍ जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम:।
नमो नम: सहस्रांशो आदित्याय नमो नम:।।१७।।
❑अर्थ➠ आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है।

❍ नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नम:।
नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।१८।।
❑अर्थ➠ उग्र (अभक्तों के लिये भयंकर), वीर (शक्ति सम्पन्न) और सारंग (शीघ्रगामी) सूर्यदेव को नमस्कार है। कमलों को विकसित करनेवाले प्रचण्ड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है।

❍ ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम:।।१९।।
❑अर्थ➠ आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है। सूर आपकी संज्ञा है। यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है। आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं। सबको स्वाहा कर देनेवाली अग्नि आपका ही स्वरुप है। आप रौद्ररूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है।

❍ तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम:।।२०।।
❑अर्थ➠ आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करनेवाले हैं। आपका स्वरूप अप्रमेय (अनन्त) है। आप कृतघ्नों का नाश करनेवाले, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है।

❍ तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।२१।।
❑अर्थ➠ आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरि (अज्ञान का हरण करनेवाले) और विश्वकर्मा (संसार के रचयिता) हैं। तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत् के साक्षी हैं। आपको नमस्कार है।

❍ नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु:।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि:।।२२।।
❑अर्थ➠ रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही सम्पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं।

❍ एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित:।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌।।२३।।
❑अर्थ➠ ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से  स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र (अग्नि में हवन) तथा अग्निहोत्री (हवन करनेवाले) पुरुषों को मिलनेवाले फल हैं।

❍ देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभु:।।२४।।
❑अर्थ➠ (यज्ञ में भाग ग्रहण करनेवाले) देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं । सम्पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।

❍ एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव।।२५।।
❑अर्थ➠ राघव! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।

❍ पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्‌।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि।।२६।।
❑अर्थ➠ इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्यहृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।

❍ अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌।।२७।।
❑अर्थ➠ महाबाहो! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए।

❍ एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्‌।।२८।।
❑अर्थ➠ उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया।

❍ आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌।
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌।।२९।।
❑अर्थ➠ और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की और देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ।

❍ रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌।।३०।।
❑अर्थ➠ फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर रावण की और देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया।

❍ अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण:।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।।३१।।
❑अर्थ➠ उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा– “रघुनन्दन! अब जल्दी करो।”

।।सम्पूर्ण ।।

इस प्रकार भगवान् सूर्य कि प्रशंसा में कहा गया और वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में वर्णित यह आदित्य हृदयम स्तोत्र सम्पन्न होता है।

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