कबीर की उल्टवासियाँ

कबीर की उल्टवासियाँ

इस लेख में कबीरसाहेब की उल्टवासियाँ कही गयी हैं, जो समझ जाने पर सीधी हैं।

साँझ पड़ी दिन ढल गया, बाघिन घेरी गाय।
गाय बिचारी न मरी, बघि न भूखी जाय ।।१।।
जीवन रूपी दिन ढल गया और अन्तिम अवस्था रूपी सन्ध्या आ गयी। मृत्युरूपी सिंहनी ने देहाध्यासी जीवरूपी गाय को घेर लिया। अविनाशी होने से जीवरूपी गाय नहीं मरती; परन्तु मृत्युरूपी सिंहनी भूखी भी नहीं जाती (जीव और शरीर का वियोग करवा देती है )।।१।।

घर जारे घर ऊबरे, घर राखे घर जाय।
एक अचंभा देखिया, मुवा काल को खाय।।२।।
अहन्ता-ममतारूपी घर को ज्ञानाग्नि से जला देने पर आत्मस्वरूपी घर बच जाता है और अहन्ता-ममतारूपी घर रखने से आत्मस्वरूपी घर नष्ट होता है। एक आश्चर्य मैंने देखा कि मृतक शरीर के जड़ अध्यास ने मनरूपी काल को खा लिया (भ्रमित कर दिया)।।२।।

तिल समान तो गाय है, बछड़ा नौ नौ हाथ।
मटकी भरि भरि दुहि लिया, पूँछ अठारह हाथ।।३।।
गायत्री या वाणीरूपी गाय छोटी-सी है, उसके व्याकरण रूपी बछड़े नौ नौ हाथ के हैं। काव्य कोष रूपी मटकी में वाणीरूपी दूध को भर-भर के लोग दुह लिये हैं और पूजा के लिए पूँछ अठारह पुराण फैले हुए हैं।।३।।

झाल उठी झोली जली, खपरा फूटम फूट।
योगी था सो रमि गया, आसन रही भभूत।।४।।
काल की आग उठी और शरीररूपी झोली जल गयी और खोपड़ी हड्डीरूपी खपड़े टूट-फूट गये। जो जीव योगी था, वह रम गया, आसन (चिता) पर केवल राख पड़ी है।।४।।

आग जु लागी नीर में, कादौं जरिया झार।
उत्तर दिसि का पण्डिता, रहा विचार विचार।।५।।
विवेकियों के अन्तः करणरूपी जलाशय में ज्ञान की अग्नि लगी और कामादिक समस्त कीचड़ जल-बल के साफ़ हो गये (अर्थात् ज्ञानी जीवन्मुक्त हो गया)। परन्तु उत्तरायण में शरीर छोड़कर मुक्ति पाने की आशा में पण्डित लोग पोथी ही विचारते-विचारते रह गये (कुछ न कर सके।)।।५।।

आहेरी दौं लाइया, मिरग पुकारे रोय।
जा बन में की लाकड़ी, दाझत है बन सोय।।६।।
बंचक गुरुरूपी शिकारी ने संसार-वन में कल्पना की आग लगायी, अज्ञानी जीवरूपी पशु रो-रोकर कल्पित पति को पुकारने लगे। जिस वन की लकड़ी है (स्वयं जलकर) उसी वन को जला रही है (एक मनुष्य स्वयं भ्रमित बनकर एवं दूसरे को भ्रम में डाल रहे हैं)।।६।।

नदिया जल कोइला भई, समुन्दर लागी आग।
मच्छी बिरछा चढ़ि गई, उठ कबीरा जाग।।७।।
संसार-समुद्र में कल्पना की आग लगी, और मत-मतान्तर रूपी नदियाँ जलकर राख हो गयीं (भ्रम गयीं)। जीवरूपी मछली कल्पना के वृक्ष पर चढ़ बैठी (अज्ञान में जीव आसक्त हुआ) अतएव ऐ जीव! उठ, सावधान हो।।७।।

जिहि सर घड़ा न डूबता, मैगल मलि मलि न्हाय।
देवल बूड़ा कलस सो, पंछि पियासा जाय।।८।।
जिस सत्संग-सरोवर में वृत्तिरूपी घड़ा नहीं डूबता था, उसमें अब मन मस्ताना मल-मल कर नहाने लगा। स्वरूप-ज्ञान रूपी कलश भर पानी से शरीर रूपी देवालय डूब गया (स्वरूप-ज्ञान में शरीर तरबतर हो गया); परन्तु पामर जीवरूपी पक्षी ज्ञान-जल बिना प्यासे ही चले जाते हैं ।।८।।

चोर भरोसे साहु के, लाया वस्तु चोराय।
पहले बाँधो साहु को, चोर आप बँधि जाय।।९।।
मनरूपी चोर साहूरूपी जीव की सत्ता से ही, विषय-वासनारूपी वस्तु को चुरा लाता है। अतएव पहले साहू (अपने आप) को सम्हालो, फिर मन स्वयं रुक जायगा।।९।।

भँवरा बारी परिहरा, मेवा बिलमा जाय।
बावन चन्दन घर किया, भूलि गया बनराय।।१०।।
(ज्ञान होने पर) मन-भँवरा विषय-बाग को त्याग कर, सद्गुण रूपी मेवे के बाग में जाकर रम गया। स्वरूप-ज्ञान रूपी छोटे चन्दन-वृक्ष में स्थित किया और विस्तृत जगत-जंगल को भूल गया ।।१०।।

सूम सदा ही उद्धरे, दाता जाय नरक्क।
कहैं कबीर यह साखि सुनि, मति कोइ जाव सरक्क।।११।।
वीर्य को एकदम न खर्च करनेवाला सूम तो उद्धार पाता है और वीर्य का दान करनेवाला दाता नरक में जाता है, इस साखी का अर्थ ठीक से सुनो-समझो, विषय में मत पतित होओ।।११।।

बैसन्दर जाड़े मरे, पानी मरे पियास।
भोजन तो भूखा मरे, पाथर मरे हगास।।१२।।
कामाग्नि में पड़े हुए जीव, जड़ाध्यास में मरते हैं। वीर्य रूपी पानी का सिंचन करनेवाले, विषय-प्यास में मरते हैं। भोग रूपी भोजन को खाने वाले तृष्णा की भूख में मरते हैं, और पत्थर सदृश कठोर-हृदय वाले अहंकारी-ईष्यालु मनुष्य परदोष-दर्शन एवं परनिन्दारूपी बीट (मलत्याग) कर-करके मरते हैं।।१२।।

कबीर उल्टा ज्ञान का, कैसे करूँ विचार।
अस्थिर बैठा पन्थ कटै, चला चली नहिं पार।।१३।।
ऐ मनुष्यो! उलटे ज्ञान का विचार कैसे किया जाय? सुनो! जो स्थिरतापूर्वक स्वरूप में शान्त हो जाता है, उसका मार्ग समाप्त होकर वह ध्येय-धाम को पहुँच जाता है और बाह्य तृष्णा-वश रात दिन भोगों में भ्रमनेवाला पन्थ का पार नहीं पाता।।१३।।

घटी बढ़ी जाने नहीं, मन में राखे जीत।
गाड़र लड़े गयन्द सो, देखो उल्टी रीत।।१४।।
सामान्यज्ञान और विशेषज्ञान का भेद जानते नहीं, तुच्छ विवादी लोग केवल अपनी जीत की भावना ही मन में रखते हैं। मताभिमानी, बकवासी, तुच्छ मनुष्यरूपी भेड़ धैर्यवान ज्ञानीरूपी मस्त हस्ती से लड़ता है, यह उलटा व्यवहार तो देखो!

माता मूये एक फल, पिता मुये फल चार।
भाई मूये हानि है, कहैं कबीर विचार।।१५।।
कबीर साहेब विचार पूर्वक कहते हैं, कि ममता रूपी माता के मर जाने से निर्बन्धता का एक महान फल है, और अहंकार रूपी पिता के मर जाने से अर्थ-धर्मादि चारों फलों की प्राप्ति होती है; परन्तु भाव रूपी भाई के मरने से कल्याण की हानि है।।१५।।

ऊनै आई बादरी, बरसन लगा अँगार।
उठि कबीरा धाह दै, दाझत है संसार।।१६।।
अज्ञान की बदली ने जीव को घेर लिया, और काम-कल्पनारूपी अंगार बरसने लगा। ऐ जीवो! चिल्लाकर रोते हुए पुकार करते रहो कि ‘संसार जल रहा है।।१६।।

हम जाये ते भी मुवा, हम भी चालन हार।
हमरे पीछे पूँगरा, तिन भी बाँधा भार।।१७।।
हमारे शरीर को उत्पन्न करनेवाले मर गये, हमारा शरीर भी (आज कल में) जाने वाला है। हमारे पीछे जो समूह हैं, वह भी अपने कर्मों की गठरी बाँधे तैयार है।।१७।।

साथी हमरे चलि गये, हम भी चालन हार।
कागद में बाकी रही, ताते लागी बार।।१८।।
हमारे साथी चले गये, हम भी अब चलने वाले हैं। अभी प्रारब्ध भोग में कुछ शेष है, इसलिये थोड़ा विलम्ब हो रहा है।।१८।।

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