कबीरवाणी (गुरु को अंग)

कबीर के दोहे

(गुरु को अंग)

जीवन में सबसे बड़ा स्थान गुरु का होता है। जिसके जीवन में गुरु न हों, वह कितना भी धनवान हो कीर्तिवान हो, उसके जीवन में अँधेरा-ही-अँधेरा है। संक्षिप्त में कहें तो गुन बिन जीवन दिशाहीन है। वास्तविक जीवन का अारम्भ तो जीवन में गुरु के पदार्पण के बाद ही होता है।

सन्त कबीरदास के गुरु रामानन्द स्वामी थे। उन्हें अपने जीवन में पाने के बाद जो अनुभूति कबीरजी ने की, उस अनुभूति को दोहे रूप में सारा जगत् जानता है।

आइये,
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के इस पोस्ट में कबीर साहेब के द्वारा गुरु के सन्दर्भ में बोले गये २४ दोहों के संकलन का हिन्दी में अर्थ जानें।

सन्त कबीरदास

❍ गुरु को कीजै दण्डवत, कोटि कोटि परनाम।
कीट न जाने भृंग को, गुरु करें आप समान।।१।।
❑अर्थ➠ गुरु को दण्डवत होकर करोड़ों बार प्रणाम कीजिये; क्योंकि जिस प्रकार कीड़ा भृंगी को नहीं जानता, [ परन्तु भृंगी (एक प्रकार की मक्खी) कीड़े को डंक मार-मारकर अपने सदृश बना लेती है ] उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को ज्ञान प्रदान करके अपने समान बना देते हैं।।१।।

❍ गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त।
वो लोहा कंचन करे, ये करि लेय महन्त।।२।।
❑अर्थ➠ गुरु और पारस पत्थर में अन्तर है, यह सब सन्त जानते हैं। (लोक कथन-अनुसार) पारस तो लोहा को सोना ही बनाता है, परन्तु गुरु शिष्य को अपने समान महान बना लेते हैं।।२।।

❍ गुरु बिन ज्ञान न ऊपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।३।।
❑अर्थ➠ गुरु के बिना ज्ञान नहीं उत्पन्न होता, गुरु के बिना मोक्ष नहीं मिलता। गुरु के बिना कोई सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकता और गुरु के बिना तन, मन, वचन के दोष नहीं मिटते।।३।।

❍ गुरु समान दाता नहीं, याचक शिष्य समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान।।४।।
❑अर्थ➠ गुरु के समान कोई दाता नहीं और शिष्य के समान याचक नहीं। तीन लोक की सम्पत्ति से भी बढ़कर ज्ञान का दान गुरु ने दे दिया।।४।।

❍ गुरु सों ज्ञान जु लीजिये, शीश दीजिये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, राखि जीव अभिमान।।५।।
❑अर्थ➠ अपने सिर (अभिमान) की भेंट चढ़ाकर गुरु से ज्ञान प्राप्त कीजिये; क्योंकि बहुत-से मूर्ख अभिमान धारण करके ही संसार में बह गये [ लेकिन गुरुपद-पोत (जलयान) में नहीं बैठे। ]।।५।।

❍ कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम जनम का मोरचा, पल में डारे धोय।।६।।
❑अर्थ➠ कुविचार रूपी कीचड़ से शिष्य का हृदय भरा है, उसे धोने के लिए गुरु का ज्ञानरूपी जल ही है। जन्म-जन्मान्तर की एकत्रित बुराइयों को गुरु ज्ञानरूपी यह जल पल भर में धो देता है।।६।।

❍ गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काटैं खोट।
अन्तर हाथ सहार दैं, बाहर बाहैं चोट।।७।।
❑अर्थ➠ गुरु कुम्हार हैं और शिष्य घड़ा। गुरु कुम्हार की तरह भीतर से स्नेहयुक्य हाथ का सहारा देकर घड़ारूपी शिष्य को बाहर से चोट मारते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन उस मार में वे शिष्य की बुराइयों को निकालकर उसे गढ़-गढ़कर सुन्दर रूप देते हैं।।७।।

❍ गुरु शरणागति छाड़ि के, करे भरोसा और।
सुख सम्पति की कह चली, नहीं नरक में ठौर।।८।।
❑अर्थ➠ गुरु की शरणागति को छोड़कर जो अन्य देव-गोसाई का भरोसा करता है, उसकी सुख-सम्पति की कौन बात चलावे? उसे तो नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा।।८।।

❍ लाख कोस जो गुरु बसैं, दीजै सुरति पठाय।
शब्द तुरी असवार ह्वै, छिन आवै छिन जाय।।९।।
❑अर्थ➠ गुरु लाखों मील की दूरी पर निवास करते हों, फिर भी अपने मन को उनके पास ही भेजना चाहिये। गुरु के शब्दरूपी उपदेश के घोड़े पर सवार होकर अपने मन से हर समय उनके पास आते-जाते रहना चाहिये।।९।।

❍ गुरु की आज्ञा आवहीं, गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो सन्त हैं आवागमन नशाय।।१०।।
❑अर्थ➠ कबीरदास कहते हैं कि व्यवहार में भी गुरु की आज्ञानुसार ही आना जाना चाहिए। सन्त वही हैं जो आवागमन का नाश करने (जन्म-मरण से पार होने) के लिए साधना करते हैं।।१०।।

❍ जो गुरु बसैं बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर।
एक पलक बिसरे नहीं, जो गुण होय शरीर।।११।।
❑अर्थ➠ यदि गुरु काशी में निवास करें और शिष्य समुद्र के तट पर हो, परन्तु शिष्य के शरीर में यदि गुरु का गुण होगा तो गुरु को एक क्षण के लिये भी नहीं भूलेगा।।११।।

❍ गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।१२।।
❑अर्थ➠ गुरु और गोविन्द दोनों सामने खड़े हैं, मैं किसके चरण लगूँ। हे गुरुदेव! आपकी ही कृपा है, जो आपने बता दिया कि ये ही ईश्वर हैं।।१२।।

❍ जैसी प्रीति कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय।
कहे कबीर ता दास का, पला न पकड़ै कोय।।१३।।
❑अर्थ➠ जिस प्रकार लोग स्त्री-पुत्रादि कुटुम्बियों से प्रेम करते हैं, यदि उसी प्रकार गुरु के प्रति प्रेम हो जाय, तो फिर उस सेवक का क्या पूछना है? अर्थात् उसका सहज ही कल्याण हो जाता है।।१३।।

❍ गुरु सों प्रीति निबाहिये, जेहि तत निबहै सन्त।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कन्त।।१४।।
❑अर्थ➠ गुरु के प्रति उत्पन्न प्रेम को किसी भी तरह निर्वाह करो। जिस प्रकार सन्त उस प्रेम को निभाते हैं; क्योंकि प्रेम के बिना गुरु निकट होते हुए भी बहुत दूर हैं और प्रेम है तो दूर होते हुए भी गुरु पास ही हैं।।१४।।

❍ सोइ सोइ नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम।
कहैं कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहुँ कुशल नहिं क्षेम।।१५।।
❑अर्थ➠ कबीरदासजी कहते हैं कि अपने मन औेर इन्द्रियों को उसी प्रकार नचाइये, जिस प्रकार गुरु के प्रति प्रेम बढ़ता जाये; गुरु के प्रेम बिना, कहीं कुशल-क्षेम नहीं है।।१५।।

❍ अहं अगिन निश दिन जरै, गुरु सो चाहे मान।
ताको जम न्योता दियो, हो हमार मेहमान।।१६।।
❑अर्थ➠ जो अहंकार की आग में रात-दिन जलते हैं और गुरु से अपना मान चाहते हैं, उनको बुरी वासना रूपी यम ने निमन्त्रण दिया है कि आओ हमारे मेहमान बनो [ तुम गुरु शरण योग्य तुम नहीं हो ]।।१६।।

❍ राजा की चोरी करे, रहै रंक की ओट।
कहत कबीर क्यों ऊबरै, काल कठिन की चोट।।१७।।
❑अर्थ➠ कोई राजा के घर से चोरी करके दरिद्र की शरण लेकर बचना चाहे तो कैसे बचेगा? इसी प्रकार सद्गुरु से ज्ञान पाने के बाद भी जो अपनी मान्यताओं से जो उबर नहीं पाता, उसे समय की असह्य मार सहनी पड़ती है।।१७।।

❍ तबही गुरु प्रिय बैन कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत।
ते रहिये गुरु सनमुखौं, कबहूँ न दीजै पीठ।।१८।।
❑अर्थ➠ शिष्य के मन में बढ़ी हुई प्रीति देखकर ही गुरु मोक्ष का उपदेश करते हैं। अतः गुरु के सम्मुख रहो, उन्हें पीठ दिखाकर विमुख मत बनो।।१८।।

❍ भवसागर की त्रास ते, गुरु की पकड़ो बाँहिं।
गुरु बिन कौन उबारसी, भव जल धारा माहिं।।१९।।
❑अर्थ➠ भवसागर के दुःखों से बचने के लिए गुरु की बाँह पकड़ लो; क्योंकि गुरु के बिना इस दुःखरूपी भवसागर की जलधारा हमें कौन उबार सकता सकता है? अर्थात् कोई नहीं।।१९।।

❍ गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे, गुरु मूरति की ओर।।२०।।
❑अर्थ➠ गुरु की मूर्ति चन्द्रमा के समान है और सेवक के नेत्र चकोर के तुल्य है। अतः आठों प्रहर गुरु-मूर्ति की ओर ही देखते रहो अर्थात् सदैव गुरु का चिन्तन करते रहो।।२०।।

❍ कोटिन चन्दा ऊगही, सूरज कोटि हजार।
तीमिर तौ नाशै नहीं, बिन गुरु घोर अँधार।।२१।।
❑अर्थ➠ करोड़ों चन्द्रमा और हजार करोड़ सूर्य उदित हों, तो भी अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश नहीं होगा। इसलिये बिना गुरु के जीवन में घोर अँधेरा ही छाया रहता है।।२१।।

❍ गुरु को सिर पर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाहिं।।२२।।
❑अर्थ➠ गुरु को अपना सिरमुकुट मानकर, उनकी आज्ञा में चलो। कबीर साहेब कहते हैं, ऐसे शिष्य-सेवक को तीनों लोक में किसी का भय नहीं होता।।२२।।

❍ गुरु महिमा गावत सदा, मन राखे अति मोद।
सो भव फिर आवै नहीं, बैठे प्रभु की गोद।।२३।।
❑अर्थ➠ जो मन को भक्तिभाव से प्रसन्न रखकर गुरुमहिमा का सदैव गुणगान करता है, वह इस भवसंसार में फिर नहीं आता, अपितु प्रभु की गोद में बैठ जाता है अर्थात् आत्म पद में स्थित हो जाता है।।२३।।

❍ सब धरती कागज करू, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।२४।।
❑अर्थ➠ सारी धरती को कागज, सारे जंगल को कलम और सातों समुद्रों की स्याही बनाकर लिखने पर भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते।।२४।।

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