कर्म का फल (गरुड़ पुराण)

कर्म का फल

(गरुड़ पुराण_अध्याय-225)

कर्म का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। शास्त्र की कुछ बातें मनुष्य समझ से परे होती है, धार्मिक वृत्ति का मनुष्य उसे मानकर अपना उद्धार कर लेता है और सांसारिक बुद्धि का मनुष्य चौरासी के चक्कर में पड़ जाता है। प्रस्तुत लेख गरुड़ पुराण का २२५ वाँ अध्याय ‘कर्मविपाक (कर्मफल) का कथन’ है। मनुष्य किन कर्मों से किन-किन को योनि को प्राप्त होता है? इसे पढ़कर आभास हो जायेगा।

कर्म का फल (गरुड़ पुराण)

सूतजी ने कहा– जगत् की सृष्टि और प्रलय आदि की चक्रगति को जाननेवाले जो विद्वान् हैं, वे यदि आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक इन तीन सांसारिक तापों को जानकर ज्ञान और वैराग्य का मार्ग स्वीकार कर लेते हैं तो आत्यन्तिक लय (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं। अब मैं उस संसार चक्र का वर्णन करूँगा, जिसको जाने बिना पुरुषार्थी परमात्मा में लीन नहीं होते।

प्राण के उत्क्रमण काल में इस शरीर का परित्याग करके मनुष्य दूसरे सूक्ष्म शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। इस मृत्युलोक से मृत्यु के पश्चात् जीव को यमराज के दूत बारह दिन की अवधि में यमलोक को ले जाते हैं। वहाँ पर उस मरे हुए व्यक्ति के बन्धु-बान्धव जो उसके लिये तिलोदक और पिण्डदान देते हैं, वही सब यमलोक के मार्ग में वह खाता-पीता है। पापकर्म करने के कारण वह नरकलोक में जाता है और पुण्यकर्म करने के कारण स्वर्ग में जाता है। अपने उन पाप पुण्यों के प्रभाव से नरक तथा स्वर्ग में गया हुआ प्राणी पुनः नरक और स्वर्ग से लौटकर स्त्रियों के गर्भ में आता है।

वहाँ विनष्ट न होकर वह दो बीजों के आकार को धारण कर लेता है। उसके बाद वह कलल (गर्भ का प्रारम्भिक रूप) फिर बुद्बुदाकार बन जाता है। तत्पश्चात् उस बुद्बुदाकार रक्त से मांसपेशी का निर्माण होता है। मांसपेशी से मांस अण्डाकार बन जाता है। वह एक पल (परिमाण विशेष) के समान होता है। उसी अण्डे से अंकुर बनता है। उस अंकुर से अंगुली, नेत्र, नाक, मुख और कान आदि अङ्ग-उपाङ्ग पैदा होते हैं। उसके बाद उस विकसित अंकुर में उत्पादक शक्ति का सञ्चार होने लगता है। जिससे हाथ-पैर की अंगुलियों में नख आदि निकल आते हैं। शरीर में त्वचा और रोम तथा बाल निकलने लगते हैं। इस प्रकार गर्भ में विकसित होता हुआ यह जीव नौ मास तक अधोमुख स्थित रहकर दसवें मास में जन्म लेता है।

तदनन्तर संसार को अत्यन्त मोहित करनेवाली भगवान् विष्णु की वैष्णवी माया उसे आवृत्त कर लेती है। यह जीव बाल्यावस्था, कौमारावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्था को प्राप्त करता है। इसके बाद यह पुनः मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह जीव इस संसारचक्र में घटीयन्त्र के समान घूमता रहता है।

जीव नरकभोग करने के पश्चात् पाप-योनि में जन्म लेता है। पतित से प्रतिग्रह स्वीकार करने के कारण विद्वान् भी अधोयोनि में जन्म ग्रहण करता है। याचक नरकभोग करने के बाद कृमि-योनि को प्राप्त होता है। गुरु की पत्नी अथवा गुरु के धन की मन से भी कामना करनेवाला व्यक्ति कुत्ता होता है। मित्र का अपमान करनेवाला गधे की योनि में जन्म लेता है। माता-पिता को कष्ट पहुँचानेवाले प्राणी को कछुए की योनि में जाना पड़ता है। जो मनुष्य अपने स्वामी का विश्वसनीय बनकर उसको छलकर जीवनयापन करता है, वह मृत्यु के बाद व्यामोह (घबराहट) में फँसे हुए वानर की योनि में जाता है।

धरोहररूप में अपने पास रखे हुए पराये धन का अपहरण करनेवाला व्यक्ति नरकगामी होता है। नरक से निकलने के पश्चात् वह कृमियोनि में जन्म लेता है। नरक से मुक्त होने पर उस ईर्ष्यालु मनुष्य को राक्षस-योनि में जाना पड़ता है। जो मनुष्य विश्वासघाती होता है, वह मत्स्ययोनि में उत्पन्न होता है। यव और धान्यादि अनाजों की चोरी करनेवाले व्यक्ति मरने के पश्चात् चूहे की योनि में जन्म लेते हैं। दूसरे की स्त्रीका अपहरण करनेवाला मनुष्य खूँखार भेड़ियेकी योनिमें जाता है। जो अपने भाई की स्त्री के साथ सहवास करता है, वह कोकिल (कोयल) योनि में जन्म लेता है। गुरु आदि की स्त्रियों के साथ सहवास करने पर मनुष्य सूअर-योनि को प्राप्त होता है।

यज्ञ, दान तथा विवाह आदि में विघ्न डालनेवाले मनुष्य को कृमि-योनि प्राप्त होती है। देवता, पितर और ब्राह्मणों को बिना भोजन आदि दिये जो मनुष्य अन्न ग्रहण कर लेता है, वह नरक को जाता है। वहाँ से मुक्त होकर वह पापी काक-योनि को प्राप्त करता है। बड़े भाई का अपमान करने से मनुष्य को क्रौञ्च (पक्षिविशेष) योनि की प्राप्ति होती है।

यदि शूद्र ब्राह्मण स्त्री के साथ रमण करता है तो वह कृमि-योनि में जन्म लेता है। उस ब्राह्मणी से यदि वह सन्तान-उत्पत्ति करता है तो वह लकड़ी में लगनेवाले घुन नामक कृमि की योनि को प्राप्त होता है।

कृतघ्न व्यक्ति कृमि, कीट, पतङ्ग तथा बिच्छू की योनियों में भ्रमण करता है। जो मनुष्य शस्त्रहीन पुरुष को मारता है, वह दूसरे जन्म में गधा होता है। स्त्री और बच्चे का वध करनेवाले को कृमि-योनि प्राप्त होती है।

भोजन की चोरी करनेवाला मक्खी की योनि में जाता है। अन्न की चोरी करनेवाला बिल्ली की योनि तथा तिल की चोरी करनेवाला चूहे की योनि में जन्म लेता है। घी की चोरी करनेवाला मनुष्य नेवला और मद्गुर (मत्स्यविशेष) के मांस की चोरी करनेवाला काकयोनि में जाता है। मधु की चोरी करने पर मनुष्य दंशकयोनि तथा अपूप (पुआ) की चोरी करने पर चींटी की योनि में जन्म लेता है। जल का अपहरण करने पर पापी व्यक्ति काकयोनि में उत्पन्न होता है। लकड़ी की चोरी करने पर मनुष्य हारीत (हारिल नामक पक्षी) अथवा कबूतर की योनि में जन्म लेता है। जो प्राणी स्वर्ण पात्र की चोरी करता है, उसको कृमियोनि में जन्म लेना है। कपास से बने वस्त्रों की चोरी पड़ता करने पर क्रौञ्च पक्षी, अग्नि की चोरी करने पर बगुला, अंगराग आदि रंजकद्रव्य (शरीर संस्कारकद्रव्य) और शाक-पात की चोरी करने पर मनुष्य मयूर होता है। लाल रंग की वस्तु की चोरी करनेसे मनुष्य जीवक (पक्षिविशेष), अच्छी गन्धवाली वस्तुओं की चोरी करने से छुछुन्दर तथा खरगोश की चोरी करनेसे वह खरगोशयोनिको प्राप्त होता है। कला की चोरी करने पर मनुष्य नपुंसक, लकड़ी की चोरी करने पर घास-फूस में रहनेवाला कीट, फूल की चोरी करने पर घास दरिद्र तथा यावक (जौका सत्तू, धान, लाख आदि) चुराने पर पंगु होता है।

शाक-पात की चोरी करनेपर हारीत और जल की चोरी करने पर चातक पक्षी होता है। जो मनुष्य किसी के घर का अपहरण करता है, वह मृत्युके पश्चात् महाभयानक रौरव आदि नरकलोकों में जाकर कष्ट भोगता है। तृण, गुल्म, लता, वल्लरी और वृक्षों की छाल चुरानेवाला व्यक्ति वृक्ष योनि को प्राप्त होता है। यही स्थिति गौ, सुवर्ण आदिकी चोरी करनेवाले मनुष्यों की भी है। विद्या की चोरी करनेवाला मनुष्य विभिन्न प्रकार के नरकलोकों का भोग करनेके पश्चात् गूँगे की योनिमें जन्म लेता है। समिधारहित अग्नि में आहुति देनेवाला मन्दाग्नि रोग से ग्रस्त होता है।

दूसरे की निन्दा करना, कृतघ्नता, दूसरे की मर्यादा को नष्ट करना, निष्ठुरता, अत्यन्त घृणित व्यवहार में अभिरुचि, परस्त्री के साथ सहवास करना, पराये धनका अपहरण करना, अपवित्र रहना, देवों की निन्दा तथा मर्यादा के बन्धन को तोड़कर अशिष्ट व्यवहार करना, कृपणता करना तथा मनुष्यों का हनन करना- नरकभोग करके जन्म लिये हुए मनुष्योंके ये लक्षण हैं, ऐसा सभी को जान लेना चाहिये।

प्राणियों के प्रति दया, सद्भावपूर्ण वार्तालाप, परलोक के लिये सात्त्विक अनुष्ठान, सत्कार्यों का निष्पादन, सत्यधर्म का पालन, दूसरेका हितचिन्तन, मुक्ति की साधना, वेदों में प्रामाण्यबुद्धि, गुरु, देवर्षि और सिद्धर्षियों की सेवा, साधुजनों द्वारा बताये गये नियमों का पालन, सत्क्रियाओं का अनुष्ठान तथा प्राणियों के साथ मैत्रीभाव ये स्वर्ग से आये हुए मनुष्यों के लक्षण हैं। जो मनुष्य योगशास्त्र द्वारा बताये यम, नियमादिक अष्टाङ्गयोग के साधनसे सद् ज्ञान को प्राप्त करता है, वह आत्यन्तिक फल अर्थात् मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।

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