गणपति वंदना

गणपति वंदना

हिन्दू धर्म में अनेक स्तोत्र देवी-देवता एवं उनके स्तोत्र हैं, जिनके द्वारा भक्तगण अपने इष्ट की आराधना करते हैं। गणपति वन्दना गणेश भक्तों के लिये बहुत ही सरल और आसानी से पढ़ा जा सकनेवाला स्तोत्र है, इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की है, इसलिये इसका माहात्म्य बताने की आवश्यकता नहीं है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा अनेक ग्रन्थों की रचना हुई है। ऐसा कहा जाता है, संसार में जितनी भी अच्छी बातें हैं, वे इनका उच्छिष्ट हैं अर्थात् इनके द्वारा कहीं-न-कहीं कही जा चुकी हैं। उन्हीं वेदव्यास के द्वारा पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड में गणेश जी की वन्दना की गयी है। अनुष्टुप् छन्द पर आधारित मात्र चार श्लोक गणेश भक्तों के लिये स्वभाव में आत्मसात् कर लेने जैसे हैं। किसी भी मंगलकार्य के पूर्व इस स्तोत्र द्वारा गणेश वन्दना बहुत ही सरल है; क्योंकि हर श्लोक में चौथे पद की पुनरावृत्ति है, जिस कारण यह आसानी से याद किया जा सकता है।

सुगम ज्ञान संगम के इस पोस्ट में इसे लघु शब्दों के साथ अर्थ सहित दिया जा रहा है ताकि इसे आसानी पढ़ा जा सके। स्तोत्र के अन्त में JPG IMAGE अवश्य डाऊनलोड कर लें ताकि इसे कभी भी आसानी पढ़ा जा सके।

श्री गणपति वंदना

❑➧एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम्।
लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम्।।१।।
❍ एक-दन्तं महा-कायं
तप्त-काञ्चन-सन्निभम्।
लम्बोदरं विशालाक्षं
वन्देऽहं गण-नायकम्।।१।।
❑अर्थ➠मैं विशालकाय, तपाये हुए स्वर्ण-सदृश प्रकाशवाले, लम्बोदर, बड़ी-बड़ी आँखोंवाले श्री एकदन्त गणनायक की वन्दना करता हूँ।।१।।

❑➧मुञ्जकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतिनम्।
बालेन्दुकलिकामौलिं वन्देऽहं गणनायकम्।।२।।
❍ मुञ्ज-कृष्णा-जिन-धरं
नाग-यज्ञो-पवीतिनम्।
बालेन्दु-कलिका-मौलिं
वन्देऽहं गणनायकम्।।२।।
❑अर्थ➠जिन्होंने मौंजीमेखला, कृष्ण-मृगचर्म तथा नाग-यज्ञोपवीत धारण कर रखे हैं, जिनके मौलिदेश (शीश) में बालचन्द्र सुशोभित हो रहा है, मैं उन गणनायक की वन्दना करता हूँ।।२।।

❑➧चित्ररत्नविचित्राङ्गं चित्रमालाविभूषणम्।
कामरूपधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम्।।३।।
❍ चित्र-रत्न-विचित्राङ्गं
चित्र-माला-विभूषणम्।
काम-रूप-धरं देवं
वन्देऽहं गणनायकम्।।३।।
❑अर्थ➠जिन्होंने अपने शरीर को विविध रत्न से अलंकृत किया है, अद्भुत माला धारण की है, जो स्वेच्छा से अनेक रूपों में अभिव्यक्त होते हैं, उन गणनायक की मैं वन्दना करता हूँ।।३।।

❑➧गजवक्त्रं सुरश्रेष्ठं चारुकर्णविभूषितम् ।
पाशांकुश धरं देवं वन्देऽहं गणनायकम्।।४।।
❍ गज-वक्त्रं सुर-श्रेष्ठं
चारु-कर्ण-विभूषितम् ।
पाशाङ्कुश धरं देवं
वन्देऽहं गणनायकम्।।४।।
❑अर्थ➠जिनका मुख हाथी मुख के समान है, जो सर्वदेवों में श्रेष्ठ हैं, सुन्दर कानों से विभूषित हैं, पाश और अंकुश धारण करनेवाले ऐसे गणनायक की मैं वन्दना करता हूँ।।४।।

।।इति श्रीपद्मपुराणे सृष्टि खण्डे महर्षि व्यास कृता श्रीगणपति वन्दना सम्पूर्णा।।
❑अर्थ➠इस प्रकार श्रीपद्मपुराण के अन्तर्गत सृष्टिखण्ड में महर्षि व्यासकृत श्री गणपति वन्दना सम्पूर्ण हुई।

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विघ्ननाशक गणेश स्तोत्र

भगवान् श्री गणेश प्रथम पूज्य और विघ्नविनाशक माने जाते हैं। उनकी स्तुति बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं होता है। हर मंगल कार्य के पूर्व उनकी वन्दना की जाती है। विघ्ननाशकगणेशस्तोत्रम् सबसे छोटा-प्रभावशाली है और केवल तीन श्लोकों का है, जिसका उल्लेख श्रीब्रह्मवैवर्तपुराण के अन्तर्गत श्रीकृष्णजन्मखण्ड में हुआ है, आइये इसका मूल पाठ सहित अर्थ जानें।

राधारानी के श्रीमुख से निकला अनुष्टुप् छन्द पर आधारित यह स्तोत्र महान पुण्यदायी, विघ्नशोक निवारक है। इसका नित्य पाठ सम्पूर्ण विघ्नों का नाश करता है। इसे दर्शकगण अवश्य कण्ठस्थ करें। मूल श्लोक गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित किताब गणेशस्तोत्ररत्नाकर से लिया गया है।

विघ्ननाशक गणेश स्तोत्र
(लघु ❍ शब्द सहित)

श्रीराधिका उवाच
❑➧ परं धाम परं ब्रह्म परेशं परमीश्वरम्।
विघ्ननिघ्नकरं शान्तं पुष्टं कान्तमनन्तकम्।।१।।
❍ परं धाम परं ब्रह्म
परेशं परमीश्वरम्।
विघ्न-निघ्न-करं शान्तं
पुष्टं कान्तम-नन्तकम्।।१।।

❑➧ सुरासुरेन्द्रैः सिद्धेन्द्रैः स्तुतं स्तौमि परात्परम्।
सुरपद्मदिनेशं च गणेशं मङ्गलायनम्।।२।।
❍ सुरा-सुरेन्द्रैः सिद्धेन्द्रैः
स्तुतं स्तौमि परात्परम्।
सुर-पद्म-दिनेशं च
गणेशं मङ्गलायनम्।।२।।

❑➧ इदं स्तोत्रं महापुण्यं विघ्नशोकहरं परम्।
यः पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वविघ्नात् प्रमुच्यते।।३।।
❍ इदं स्तोत्रं महा-पुण्यं
विघ्न-शोक-हरं परम्।
यः पठेत् प्रात-रुत्थाय
सर्व-विघ्नात् प्रमुच्यते।।३।।

❑➧।।इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे विघ्ननाशकगणेश स्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

हिन्दी अर्थ

श्री राधिका ने कहा
❑अर्थ➠ जो परम धाम, परब्रह्म, परेश, परम ईश्वर, विघ्नों के विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर और अनन्त हैं।।१।।

❑अर्थ➠ प्रधान-प्रधान सुर, असुर और सिद्ध जिनका स्तवन करते हैं; जो देवरूपी कमल के लिये सूर्य और मंगल आश्रय-स्थान हैं, उन परात्पर गणेश की मैं स्तुति करती हूँ।।२।।

❑अर्थ➠ यह उत्तम स्तोत्र महान् पुण्यमय तथा विघ्न और शोक हरनेवाला है। जो प्रात:काल उठकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण विघ्नों से मुक्त हो जाता है।।३।।

❑अर्थ➠ इस प्रकार श्री ब्रह्मवैवर्त पुराण के अन्तर्गत श्रीकृष्ण जन्म खण्ड में विघ्न नाशक गणेश स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।

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