चाणक्य नीति अध्याय-१

चाणक्य नीति अध्याय-१

नीति शब्द से जुड़कर बने राजनीति शब्द का आज के समय में बड़ा ही बेहूदा अर्थ लगाया जाता है; जबकि नीति का अर्थ होता है सुव्यवस्था और राजनीति का अर्थ होता है राज्य की सुव्यवस्था।

आचार्य चाणक्य के अनुसार राजनीति यदि धर्म दूर चली जाये तो उसके भटक जाने की पूर्ण सम्भावना रहती है और आज के समय में यही हो रहा है, राज्य की सुव्यवस्था का धर्म अर्थात् कर्तव्य पालन से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।

राजनेताओं ने राजनीति के नाम पर पूरे समाज को खोखला कर दिया है। ख़ैर, इस विषय पर बात करने का कोई औचित्य नहीं है। आइये, हम चाणक्य नीति को समझें और इसकी सर्वज्ञता को अमल में लायें।

।।अथ प्रथमोऽध्यायः ।।

❑➧ प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम्।
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम्।।१।।
❑अर्थ➠ तीनों लोक के अधिपति भगवान् विष्णु को मैं शीश झुकाकर प्रणाम करता हूँ और अनेक शास्त्रों से संचित किए गए राजनीति से सम्बन्धित ज्ञान का वर्णन रहा हूँ।।१।।

❑➧ अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः। धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्य शुभाशुभम्।।२।।
❑अर्थ➠ श्रेष्ठ पुरुष इस नीति-शास्त्र का विधिपूर्वक अध्ययन करके यह बात भलीभाँति जान जायेंगे कि धर्मशास्त्रों में कौन-से कार्य करने योग्य बताए गये हैं और कौन-से कार्य न करने योग्य? क्या शुभ (पुण्य) है और क्या अशुभ (पाप) है, यह भी जान जायेंगे।।२।।

❑➧ तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया।
येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते।।३।।
❑अर्थ➠ अब मैं मानवमात्र के कल्याण की कामना से राजनीति के उस ज्ञान का वर्णन करूँगा, जिसे जानकर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है।।३।।

चाणक्य कहते हैं कि इस ग्रन्थ को पढ़कर कोई भी व्यक्ति दुनियादारी और राजनीति की बारीकियाँ समझकर सर्वज्ञ हो जाएगा। यहाँ ‘सर्वज्ञ’ शब्द का अर्थ सब कुछ जानने से नहीं है, अपितु ऐसी बुद्धि प्राप्त करना है, जिससे व्यक्ति में समय के अनुरूप प्रत्येक परिस्थिति में कोई भी निर्णय लेने की क्षमता आ जाये।

❑➧ मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च।
दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति।।४।।
❑अर्थ➠ मूर्ख शिष्य को उपदेश देने से, दुष्ट-व्यभिचारिणी स्त्री का पालन पोषण करने से, धन नष्ट हुए दुखी अर्थात् विषादग्रस्त व्यक्ति (जो अपने विचारों पर स्थिर न हो) उसके साथ व्यवहार रखने से बुद्धिमान व्यक्ति को भी कष्ट उठाना पड़ता है।।४।।

❑➧ दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः।।५।।
❑अर्थ➠ दुष्ट स्वभाववाली, कठोर वचन बोलनेवाली, दुराचारिणी स्त्री और धूर्त मित्र, मुँहफट नौकर और जिस घर में साँप रहते हो, ये सब बातें मृत्यु के समान हैं।।५।।

जिस घर में दुष्ट स्त्रियाँ होती हैं, वहाँ घर के मालिक कोई वश नहीं चलता और वह भीतर ही भीतर कुढ़ते हुए मृत्यु की ओर सरकता रहता है। इसी प्रकार धूर्त मित्र भी विश्वास के योग्य नहीं होता, न जाने कब धोखा दे दे। आपके अधीन काम करनेवाला कर्मचारी अर्थात् नौकर उलटकर आपके सामने जवाब देता है, वह कभी भी आपको असहनीय हानि पहुँचा सकता है। इसी प्रकार जहाँ साँपों का वास हो, वहाँ रहना भी ख़तरनाक है। न जाने कब सर्पदंश का शिकार होना पड़ जाए। ये सारी बातें मृत्यु के समान हैं।

दुष्टों पर कभी विश्वास न करें।

❑➧ आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि।।६।।
❑अर्थ➠ आपत्तिकाल से बचाव के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए और धन ख़र्च करके भी पत्नी की रक्षा करनी चाहिए, परन्तु पत्नी और धन से भी अधिक आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी रक्षा करे।।६।।

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि भावी संकट से बचने के लिये धन का संग्रह करे और धन से भी अधिक अपनी पत्नी की रक्षा करे; क्योंकि पत्नी जीवनसंगिनी होती है। बहुत-से ऐसे अवसर होते हैं, जहाँ धन काम नहीं आता, अपितु पत्नी ही काम आती है। इन दोनों से अधिक आवश्यक है स्वयं की रक्षा करें। धन से अधिक अपनी रक्षा करना तो ठीक है, परन्तु पत्नी से अधिक अपनी रक्षा करें, इसका तात्पर्य ऐसी पत्नियों से है, जो पति के साथ छलपूर्वक रहती हैं, ऐसी पत्नियों के साथ पति संकट में हो, तो पति को स्वयं की रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि स्वयं का ही नाश हो जाये तो धन और ऐसी स्त्री का क्या प्रयोजन?

❑➧ आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः।
कदाचिच्चलिता लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति।।७।।
❑अर्थ➠ आपत्तिकाल के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन श्रीमन्त पुरुषों के पास विपत्ति का क्या काम और फिर लक्ष्मी तो चंचला है, वह संचित करने पर भी नष्ट हो जाती है।।७।।

श्री शब्द का अनेक अर्थ लिया जाता है, जिसमें एक अर्थ होता है बुद्धि अर्थात् जिसके पास बुद्धिमानी है, विपत्ति उसके पास रुक नहीं सकती। संकट के समय से बचने के लिये धन अर्थात् लक्ष्मी की रक्षा तो करें, लेकिन संग्रह नहीं; क्योंकि वह चंचला है, संग्रह करने पर भी कहीं न कहीं नष्ट हो ही जाती है।

❑➧ यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत्।।८।।
❑अर्थ➠ जिस देश में आदर-सम्मान नहीं और न ही आजीविका का कोई साधन है, जहाँ कोई बंधु-बांधव, रिश्तेदार भी नहीं तथा किसी प्रकार की विद्या और गुणों की प्राप्ति की सम्भावना भी नहीं, ऐसे देश को छोड़ ही देना चाहिए।।८।।

❑➧ श्रोत्रियो धनिकः राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्।।९।।
❑अर्थ➠ जहाँ श्रोत्रिय ब्राह्मण, धनिक, राजा, नदी और वैद्य ये पाँच चीजें न हों, उस स्थान पर मनुष्य को एक दिन भी नहीं रहना चाहिए।।९।।

धनवान लोगों से व्यापार की वृद्धि होती है। वेद को जाननेवाले ब्राह्मण धर्म की रक्षा करते हैं। राजा न्याय और शासन-व्यवस्था को स्थिर रखता है। जल तथा सिंचाई के लिए नदी आवश्यक है। रोगों से छुटकारा पाने के लिए वैद्य की आवश्यकता होती है। चाणक्य कहते हैं कि जहाँ पर ये पाँचों चीज़ें न हों, वहाँ नहीं रहना चाहिये।

❑➧ लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संस्थितिम्।।१०।।
❑अर्थ➠ जहाँ लोकयात्रा अर्थात जीवन को चलाने के लिए आजीविका का कोई साधन न हो, व्यापार आदि विकसित न हो, किसी को (किसी प्रकार के अपराध करने पर) दण्ड के मिलने का भय न हो, लोकलाज न हो, व्यक्तियों में शिष्टता और उदारता न हो अर्थात उनमें दान देने की प्रवृत्ति न हो, ये पाँचों चीज़ें जहाँ विद्यमान न हों, वहाँ निवास नहीं करना चाहिए।।१०।।

❑➧ जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनाऽऽगमे।
मित्रं चापत्तिकालेषु भार्या च विभवक्षये।।११।।
❑अर्थ➠ काम लेने पर नौकर-चाकरों की, दुःख आने पर बंधु-बांधवों की, कष्ट आने पर मित्र की तथा धन-नाश होने पर अपनी पत्नी की वास्तविकता का ज्ञान होता है।।११।।

❑➧ आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रु-संकटे।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः।।१२।।
❑अर्थ➠ किसी रोग से पीड़ित होने पर, दु:ख आने पर, अकाल पड़ने पर, शत्रु की ओर से संकट आने पर, राजसभा में, श्मशान अथवा किसी की मृत्यु के समय जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वही सच्चा बन्धु माना जाता है।।१२।।

❑➧ यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिसेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि।।१३।।
❑अर्थ➠ जो मनुष्य निश्चित को छोड़कर अनिश्चित के पीछे भागता है, उसका कार्य या पदार्थ नष्ट हो जाता है।।१३।।
चाणक्य का अभिप्राय है, जो भी सहजता से उपलब्ध हो जाये, उसी में सन्तोष करना चाहिए। जो व्यक्ति आधी छोड़कर पूरी के पीछे भागते हैं, उनके हाथ से आधी भी निकल जाती है।

❑➧ वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम्।
रूपवतीं न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले।।१४।।
❑अर्थ➠ श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुई कुरूप अर्थात् सौंदर्यहीन कन्या से भी विवाह करना उचित है, परन्तु नीच कुल में उत्पन्न हुई सुन्दर कन्या से विवाह न करना चाहिये। विवाह अपने समान कुल में ही करना चाहिए। यहाँ ‘कुल’ का तात्पर्य धन-संपदा से नहीं, अपितु परिवार के चरित्र से है।।१४।।

❑➧ नखीनां च नदीनां च शृंगीणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यो स्त्रीषु राजकुलेषु च।।१५।।
❑अर्थ➠ बड़े-बड़े नाखूनोंवाले (शेर, चीता आदि), विशाल नदियाँ, बड़े-बड़े सींग वाले (साँड़ आदि पशु), शस्त्र धारण करनेवाले, स्त्रियों तथा राजा से सम्बन्धित कुलवाले व्यक्तियों का विश्वास कभी नहीं करना चाहिए।।१५।।

बड़े-बड़े नाखूनों वाले हिंसक प्राणी से बचकर रहना चाहिए, न जाने वे कब आपके ऊपर हमला कर दें। जिन नदियों के तट पक्के नहीं, उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। न जाने उनका वेग कब प्रचण्ड रूप धारण कर ले और कब उनकी दिशा बदल जाए, न जाने वे और किधर को बहना प्रारम्भ कर दें। बड़े-बड़े सींगवाले साँड़ आदि पशुओं का भी भरोसा नहीं है, कौन जाने उनका मिजाज कब बिगड़ जाए? जिसके पास तलवार आदि कोई हथियार है, उसका भी भरोसा नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह छोटी-सी बात पर क्रोध में आकर कभी भी आक्रामक हो सकता है। चंचल स्वभाववाली स्त्रियों पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए। वह अपनी चतुराई से कभी भी आपके लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ पैदा कर सकती हैं। राजा से सम्बन्धित राजसेवकों और राजकुल के व्यक्तियों पर भी विश्वास करना उचित नहीं। वे कभी भी राजा के कान भरकर अहित करवा सकते हैं; क्योंकि वे राज नियमों के प्रति समर्पित और निष्ठावान् होते हैं। राजहित और निजी स्वार्थ उनके लिए प्रमुख होता है-सम्बन्ध नहीं।

❑➧ विषादप्यमृतं ग्राह्यममेधयादपि काञ्चनम्।
नीचादप्युत्तमा विद्या स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि।।१६।।
❑अर्थ➠ विष में भी अमृत हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। अपवित्र और अशुद्ध वस्तुओं में भी यदि सोना अर्थात् मूल्यवान वस्तु पड़ी हो तो वह भी उठा लेने के योग्य होती है। नीच मनुष्य के पास कोई अच्छी विद्या है तो उसे सीखने में कोई हानि नहीं। इसी प्रकार दुष्ट कुल में उत्पन्न अच्छे गुणों से युक्त स्त्री रूपी रत्न को ग्रहण कर लेना चाहिए।।१६।।

❑➧ स्त्रीणां द्विगुण आहारो बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा।
साहसं षड्गुणं चैव कामोऽष्टगुण उच्यते।।१७।।
❑अर्थ➠ पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का आहार दोगुना होता है, बुद्धि चौगुनी, साहस छह गुना और काम आठ गुना होती है।।१७।।

इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ तो आप समझ गये होंगे, किन्तु मार्मिक अर्थ कुछ और ही है। स्त्रियों से ही स्त्री-पुरुष दोनों जन्म लेते हैं। यहाँ आहार का अर्थ भोजन से नहीं, अपितु पौष्टिकता से है। स्त्रियों को पुरुष की अपेक्षा दोगुना पौष्टिक पदार्थों की आवश्यता होती है; क्योंकि माँ बनते समय यदि पौष्टिकता न मिले तो सन्तान पर उसका प्रभाव देखा जाता है।

बुद्धी चौगुनी होने की बात पर ग़ौर करे तो घर परिवार में अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होने पर स्त्रियाँ ही अपनी बुद्धिमता घर को बनाये रख सकती है, इसलिये कहा जाता है कि औरत चाहे तो घर बसा सकती है, औरत चाहे तो घर बरबाद कर सकती है।

साहस छः गुना कहने का अभिप्राय है कि अपनी सन्तान पर आफ़त देखकर किसी भी माँ का साहस अपनी शारीरिक शक्ति से कई गुना बढ़ जाता है।

काम आठ गुना कहने का अर्थ वासना से नहीं, अपितु इच्छाओं से है, स्त्रियों की इच्छाशक्ति अर्थात् मनोबल पुरुषों की अपेक्षा कई गुना अधिक होता है। एक विधवा युवा स्त्री सम्पूर्ण जीवन अपने पति के लिये समर्पित होकर रह सकती है। लेकिन एक विधुर युवा अपनी पत्नी के लिये नहीं रह सकता।