पुनि पुनि चन्दन पुनि पुनि प‍ानी

पुनि पुनि चन्दन पुनि पुनि प‍ानी।
गल गये ठाकुर हम का जानी।।

इस चौपाई को हमने कभी न कभी सुना ही होगा। शायद ही ऐसा कोई काव्यप्रेमी होगा, जो इस चौपाई से अनभिज्ञ हो। इसके पीछे की जो कहानी है, बड़ी ही रोमांचक है। सामान्यतः एक पण्डितजी और चेले के रूप में यह कहानी सुनने में आती है। कहीं-कहीं अगस्त्य मुनि और सुतीक्ष्ण के रूप में भी पढ़ी-सुनी गयी है। प्रामाणिकता न होने के कारण इसे सुगम ज्ञान संगम के कहानियाँ + पारम्परिक स्तम्भ में रखा गया है।

आइये, इस कहानी का आनन्द लेते हैं।

एक पण्डितजी थे, जो नित्य-नियम से ठाकुरजी (शालिग्राम) की पूजा-अर्चना किया करते थे। उनका एक चेला था, जो प्रतिदिन उनकी इस नित्य क्रिया को देखा करता था। उसने कभी ठाकुरजी को हाथ में लेकर नहीं देखा था कि ये कैसे हैं, बस दूर से ही पण्डितजी को उनकी सेवा-अर्चना करते देखता था।

एक दिन पण्डितजी को सुबह-सुबह कहीं जाना था। चिन्तित हो उठे कि ठाकुरजी की सेवा कौन करेगा? उनको चेले की याद आयी। चेले को बुलाया और बोले─ “देखो, तुम मुझे नित्य देखते हो कि मैं ठाकुरजी की पूजा कैसे करता हूँ। आज मुझे किसी काम से बाहर जाना है, शाम को लौट आऊँगा। आज ठाकुरजी की सेवा तुम्हें करनी है।”

चेले ने हामी भर दी। सोचा, जैसे गुरुजी करते हैं, वैसे ही तो करना है। पण्डितजी चले गये। चेलाराम बैठ गया, ठाकुरजी की सेवा करने। पण्डितजी की तरह उसने ठाकुरजी को नहलाया-धुलाया, चन्दन लगाया। भोग भी लगा दिया ताकि ठाकुरजी भूखे न रहे।

सब कुछ हो जाने पर सोचने लगा, ये ठाकुरजी तो पत्थर की तरह जान पड़ते हैं। एक पेड़ के नीचे सोकर, ऊपर की तरफ़ देखते हुए इसी सोच में डूबा था। जामुन का पेड़ था और गर्मी का महीना। पेड़ पर फल ख़ूब लदे थे। जामुन देखते ही चेलाराम के मन के विचारों की धारा बदल गयी। अब जामुन कैसे खाया जाये? यह सोचने लगा। यहाँ-वहाँ नज़र दौड़ाई, पर पत्थर नहीं दिखाई दिया। अन्त में ठाकुरजी पर नज़र टिक गयी। सोचा, ठाकुरजी से ही जामुन तोड़ लेता हूँ, गुरुजी के आने के पहले, उनको उनकी जगह पर रख दूँगा।

बस, फिर सोचना क्या था! ठाकुरजी को उठाकर निशाना लगाता गया, जामुन गिरते गये। सोचा, अन्तिम बार एक और निशाना लगा दूँ, उसके बाद बैठकर आराम से जामुन खाऊँगा।

लेकिन संजोग ऐसा रहा कि इस बार न निशाना लगा, न जामुन गिरा। हाँ, ठाकुरजी ज़मीन पर गिरने की बजाय पास की बहती नदी में जा गिरे। चेले के मन से जामुन खाने का ख़याल छूट गया और ठाकुरजी (शालिग्राम) की चिन्ता होने लगी; क्योंकि गुरुजी के आने के पहले ठाकुरजी को उनकी जगह पर रखना था। चेलाराम ने नदी में डुबकी लगाकर ठाकुरजी को बहुत ढूँढ़ने का प्रयास किया, लेकिन ठाकुरजी नहीं मिले। सोच में पड़ गया कि अब क्या करूँ? ठाकुरजी (शालिग्राम) की जगह किसे रखूँ ताकि गुरुजी की डाँट न खानी पड़े।

अब तो उसे पेड़ से तोड़ा हुआ हर जामुन ठाकुरजी की तरह दिखाई देने लगा। एक बड़ा-सा जामुन उठाकर उसने ठाकुरजी की जगह (चौकी) पर रख दिया।

शाम को पण्डितजी आये तो कुछ मालूम नहीं पड़ा; क्योंकि जामुन शालिग्राम की तरह ही दिखाई दे रहा था। दूसरे दिन सुबह पण्डितजी ठाकुरजी को स्नान करा रहे थे, लेकिन ठाकुरजी की जगह तो चेले द्वारा रखा गया जामुन था। थोड़ा-सा ज़ोर लगते ही जामुन में से गुठली (बीज) निकलकर बाहर आ गयी। पण्डितजी तिलमिला गये। चेले को बुलाया, बोले─ “ठाकुरजी कहाँ गये? और उनकी जगह पर जामुन किसने रख दिया?”

चेलाराम क्या जवाब दे? ठाकुरजी तो नदी की तलहटी में जा बैठे। गुरुजी से जान बचाने के लिये कह दिया─
पुनि पुनि चन्दन पुनि पुनि प‍ानी।
गल गये ठाकुर हम का जानी।।
अर्थात्
गुरुजी, बार-बार चन्दन लगाने और बार-बार पानी में नहलाने के कारण ठाकुरजी गल गये होंगे, मैं कुछ नहीं जानता।

कहीं-कहीं इस कहानी में चेले की जगह पण्डितजी के बच्चे का ज़िक्र आता है। परम्परागत सुनी गयी कहानियों में घटनाक्रम और पात्र की मौलिकता नहीं रहती, अतः इसका अन्य स्वरूप भी कहीं आपको पढ़ने मिल सकता है। सुगम ज्ञान संगम उद्देश्य था, दर्शकों को उपरोक्त चौपाई की कहानी से अवगत कराना।

‍─ संजय सोनकर

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