मृतसंजीवन कवच

मृतसंजीवन कवच

मृतसञ्जीवन कवच भगवान् राम के गुरु वसिष्ठ ऋषि द्वारा रचित भगवान् शिव की वाणी है। वसिष्ठ महाराज ने अपने शिष्यों के समक्ष यह जिस प्रकार सुनाया, यहाँ वर्णित है। इस भगवान् शिव के भिन्न-भिन्न स्वरूपों से समस्त दिशाओं में स्वयं की रक्षा करने का अनुरोध है। अपने शरीर के समस्त अंगों के साथ-साथ पुत्र-पत्नी की भी रक्षा करने की विनती है।

यह स्तोत्र देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। मरणासन्न व्यक्ति को काल के गाल से यह स्तोत्र बचा सकता है। जो इसका पाठ करता है या फिर इस कवच को सुनता या सुनाता है, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती। इस कवच की सहस्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है अर्थात् जो साधक इसका एक हज़ार बार पाठ कर लेता है, उसके लिये यह कवच सिद्ध हो जाता है। नित्य भगवान् शिव के पूजन के बाद प्रातःकाल इसका पाठ लोक-परलोक दोनों को सुखदायक बना देता है। उसे किसी रोग का भय नहीं रहता।

इसकी फलश्रुति में कहा गया है,
जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु का उपभोग करता है। जो साधक अपने हाथ से मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसंजीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणी के भीतर चेतना आ जाती है। युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसंजीवन कवच का २८ बार पाठ करके रणभूमि में उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुओं से अदृश्य रहता है। यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड़ जाए तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नहीं कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है।

आप समझ सकते हैं कि यह कवच कितना शक्तिशाली और प्रभावशाली है। सुगम ज्ञान संगम के इस पोस्ट में मूल श्लोक गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित शिवस्तोत्र रत्नाकर पर आधारित हैं। अन्त में pdf उपलब्ध है।

❀ मृतसञ्जीवन कवच ❀
(❑➧मूल श्लोक ❍ लघु शब्द)

❑➧एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम्।
मृतसञ्जीवनं नाम कवचं प्रजपेत् सदा।।१।।
❍ एव माराध्य गौरीशं
देवं मृत्युञ्जयेश्वरम्।
मृत सञ्जीवनं नाम
कवचं प्रजपेत् सदा।।१।।

❑➧सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद् गुह्यतरं शुभम्।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनाभिधम्।।२।।
❍ सारात् सारतरं पुण्यं
गुह्याद् गुह्यतरं शुभम्।
महा देवस्य कवचं
मृत सञ्जीवना भिधम्।।२।।

❑➧समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभम्।
श्रुत्वैतद् दिव्यकवचं रहस्यं कुरु सर्वदा।।३।।
❍ समाहित मना भूत्वा
शृणुष्व कवचं शुभम्।
श्रुत्वैतद् दिव्य कवचं
रहस्यं कुरु सर्वदा।।३।।

❑➧जराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः।
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा।।४।।
❍ जरा भयकरो यज्वा
सर्व देव निषेवितः।
मृत्युञ्जयो महादेवः
प्राच्यां मां पातु सर्वदा।।४।।

❑➧दधानः शक्तिमभयां त्रिमुखः षड्भुजः प्रभुः।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा।।५।।
❍ दधानः शक्ति मभयां
त्रिमुखः षड्भुजः प्रभुः।
सदाशिवो ऽग्निरूपी
मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा।।५।।

❑➧अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः।
यमरूपी महादेवो दक्षिणस्यां सदाऽवतु।।६।।
❍ अष्टादश भुजोपेतो
दण्डा भयकरो विभुः।
यमरूपी महादेवो
दक्षिणस्यां सदाऽ वतु।।६।।

❑➧खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः।
रक्षारूपी महेशो मां नैर्ऋत्यां सर्वदाऽवतु।।७।।
❍ खड्गा भयकरो धीरो
रक्षोगण निषेवितः।
रक्षा रूपी महेशो मां
नैर्ऋत्यां सर्वदाऽ वतु।।७।।

❑➧पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः।
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदाऽवतु।।८।।
❍ पाशा भय भुजः सर्व
रत्नाकर निषेवितः।
वरुणात्मा महादेवः
पश्चिमे मां सदा ऽवतु।।८।।

❑➧गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः।
वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा।।९।।
❍ गदा भयकरः प्राण
नायकः सर्वदा गतिः।
वायव्यां मारुतात्मा मां
शङ्करः पातु सर्वदा।।९।।

❑➧शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः।।१०।।
❍ शङ्खा भय करस्थो मां
नायकः परमेश्वरः।
सर्वात्मान्तर दिग्भागे
पातु मां शङ्करः प्रभुः।।१०।।

❑➧शूलाभयकरः सर्वविद्यानामधिनायकः।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः।।११।।
❍ शूलाभयकरः सर्व
विद्या नाम धिनायकः।
ईशानात्मा तथै शान्यां
पातु मां परमेश्वरः।।११।।

❑➧ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽधः सदाऽवतु।
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः।।१२।।
❍ ऊर्ध्व भागे ब्रह्म रूपी
विश्वात्माऽधः सदाऽ वतु।
शिरो मे शङ्करः पातु
ललाटं चन्द्र शेखरः।।१२।।

❑➧भ्रूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिनेत्रोऽवतु लोचने।
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः।।१३।।
❍ भ्रूमध्यं सर्व लोकेशस्
त्रिनेत्रोऽ वतु लोचने।
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु
कर्णौ पातु महेश्वरः।।१३।।

❑➧नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः।
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान् मे गिरिशोऽवतु।।१४।।
❍ नासिकां मे महादेव
ओष्ठौ पातु वृषध्वजः।
जिह्वां मे दक्षिणा मूर्तिर्
दन्तान् मे गिरिशो ऽवतु।।१४।।

❑➧मृत्युञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण।
पिनाकी मत्करौ पातु त्रिशूली हृदयं मम।।१५।।
❍ मृत्युञ्जयो मुखं पातु
कण्ठं मे नाग भूषण।
पिनाकी मत्करौ पातु
त्रिशूली हृदयं मम।।१५।।

❑➧पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः।
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वे मे पार्वतीपतिः।।१६।।
❍ पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु
उदरं जगदीश्वरः।
नाभिं पातु विरू पाक्षः
पार्श्वे मे पार्वती पतिः।।१६।।

❑➧कटिद्वयं गिरीशो मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः।
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः।।१७।।
❍ कटि द्वयं गिरीशो मे
पृष्ठं मे प्रमथाधिपः।
गुह्यं महेश्वरः पातु
ममोरू पातु भैरवः।।१७।।

❑➧जानुनी मे जगद्धर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः।।१८।।
❍ जानुनी मे जगद्धर्ता
जङ्घे मे जगदम्बिका।
पादौ मे सततं पातु
लोकवन्द्यः सदाशिवः।।१८।।

❑➧गिरीशः पातु मे भार्यां भव पातु सुतान् मम।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः।।१९।।
❍ गिरीशः पातु मे भार्यां
भव पातु सुतान् मम।
मृत्युञ्जयो ममा युष्यं
चित्तं मे गण नायकः।।१९।।

❑➧सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम्।।२०।।
❍ सर्वाङ्गं मे सदा पातु
काल कालः सदाशिवः।
एतत्ते कवचं पुण्यं
देवतानां च दुर्लभम्।।२०।।

❑➧मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम्।
सहस्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम्।।२१।।
❍ मृत सञ्जीवनं नाम्ना
महादेवेन कीर्तितम्।
सहस्रा वर्तनं चास्य
पुरश्चरण मीरितम्।।२१।।

❑➧यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत् सुसमाहितः।
सोऽकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते।।२२।।
❍ यः पठेच्छृणु यान्नित्यं
श्रावयेत् सुसमाहितः।
सोऽकाल मृत्युं निर्जित्य
सदा युष्यं समश्नुते।।२२।।

❑➧हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसो।
आधयो व्याधयस्तस्य न भवन्ति कदाचन।।२३।।
❍ हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा
मृतं सञ्जीव यत्यसो।
आधयो व्याध यस्तस्य
न भवन्ति कदाचन।।२३।।

❑➧कालमृत्युमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा।
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः।।२४।।
❍ काल मृत्यु मपि प्राप्त
मसौ जयति सर्वदा।
अणिमादि गुणैश्वर्यं
लभते मानवोत्तमः।।२४।।

❑➧युद्धारम्भे पठित्वेदमष्टाविंशतिवारकम्।
युद्धमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते।।२५।।
❍ युद्धा रम्भे पठित्वेद
मष्टा विंशति वारकम्।
युद्ध मध्ये स्थितः शत्रुः
सद्यः सर्वैर्न दृश्यते।।२५।।

❑➧न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै।
विजयं लभते देवयुद्धमध्येऽपि सर्वदा।।२६।।
❍ न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि
क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै।
विजयं लभते देव
युद्ध मध्येऽपि सर्वदा।।२६।।

❑➧प्रातरुत्थाय सततं यः पठेत् कवचं शुभम्।
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च।।२७।।
❍ प्रात रुत्थाय सततं
यः पठेत् कवचं शुभम्।
अक्षय्यं लभते सौख्य
मिह लोके परत्र च।।२७।।

❑➧सर्वव्याधिविनिर्मुक्तः सर्वरोगविवर्जितः।
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडश वार्षिक।।२८।।
❍ सर्व व्याधि विनिर्मुक्तः
सर्व रोग विवर्जितः।
अजरामरणो भूत्वा
सदा षोडश वार्षिक।।२८।।

❑➧विचरत्य खिलाँल्लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान्।
तस्मादिदं महागोप्यं कवचं समुदाहृतम्।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना ‍दैवतैरपि दुर्लभम्।।२९।।
❍ विचरत्य खिलाँल् लोकान्
प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान्।
तस्मादिदं महा गोप्यं
कवचं समुदा हृतम्।
मृत सञ्जीवनं नाम्ना
दैव तैरपि दुर्लभम्।।२९।।

इति महर्षिवसिष्ठविरचितं मृतसञ्जीवन कवचं सम्पूर्णम्।।

एक अभूतपूर्व स्तोत्र

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