राम रक्षा स्तोत्र मूलपाठ Ram raksha stotra

राम रक्षा स्तोत्र मूलपाठ में…

पूर्ण रूप से भगवान् श्रीराम की महिमा गायी गयी है। रामनाम की महिमा का क्या महत्त्व है? यह तो इस स्तोत्र को पढ़ने पर ही मालूम हो जाता है। भोलेनाथ स्वयं कहते हैं कि रामनाम विष्णुसहस्रनाम के तुल्य है। मैं सदा ही इस रामनाम में रमण करता हूँ।

कहीं-कहीं क्षेपक कथा पढ़ने में आती है कि एक बार भगवान् शिव ने रामनाम की महिमा गाते हुए एक लाख श्लोकों की रचना कर दी। जब यह बात सबको पता चली तो देव-दानव और मनुष्यों ने उनके पास आकर विनती की, इसे हमें प्रदान करें।

भोलेनाथ ने तैंतीस-तैंतीस हज़ार (३३०००) श्लोक तीनों में बाँट दिये और एक हज़ार अपने लिये रख लिया। तीनों ने पुनः विनती की इसे भी हम तीनों में वितरण कर दें। भोलेनाथ ने तीन-तीन सौ (३००) श्लोक तीनों में बाँट दिया और सौ श्लोक अपने लिये रख लिये। देव-दानव और मनुष्यों ने फिर प्रार्थना की कि इसे भी हम तीनों में बाँट दें।

भगवान् शिव ठहरे औढरदानी, फिर से तैंतीस-तैंतीस (३३) श्लोक बाँट दिये और मात्र एक श्लोक अपने पास रख लिया। अब एक श्लोक का वितरण तो नहीं हो सकता, परन्तु तीनों ने पुनः प्रार्थना की कि एक श्लोक भी समान रूप से हमें बाँट दें, आप इस एक श्लोक का क्या करेंगे? तब भोलेनाथ ने बत्तीस (३२) अक्षर के उस एक श्लोक में से दस-दस (१०) अक्षर देव-दानव और मनुष्यों में बाँट दिया और उस श्लोक में से केवल ‘राम’ नाम को अपने हृदय में धारण किया। राम नाम की महिमा अद्भुत है! यह दो अक्षर का नाम सर्वदुःख-भंजन है।

इस स्तोत्र के पाठ से बड़े-से-बड़े संकट का निवारण हो जाता है, यह रामभक्तों का अनुभव है। आरोग्य हेतु यह सच में रामबाण ही है; क्योंकि श्लोक क्रमांक ४ से श्लोक क्रमांक १० तक भगवान् श्रीराम को भिन्न-भिन्न रूपों में स्मरण करते हुए स्वयं के शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करने की विनती की गयी है। जिसके अंगरक्षक स्वयं भगवान् हों, उसे किस रोग और बात का भय? इसे कण्ठ में धारण करना अर्थात् कठस्थ कर लेना, सर्वसिद्धिदायी है।

रात के समय स्वप्न में बुधकौशिक ऋषि ने जो उपदेश सुना, जो भगवान् शिव ने माता पार्वती को दिया, प्रातःकाल जगने पर ऋषि ने वह उपदेश (स्तोत्र्) यथावत् लिख दिया। यह अप्रत्यक्ष रूप से भगवान् शिव की वाणी है, जिसे बुधकौशिक ऋषि ने समाज को प्रदान किया।

राम भक्तों को तो पता ही होगा, परन्तु नये पाठकों को बता दें कि─
हनुमानजी वन्दना में बोला जानेवाला मन्त्र श्लोक “मनोजवं मारुततुल्य वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं…”
और
रामजी की वन्दना के लिये बोले जानेवाला मन्त्र श्लोक “लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं…”
ये दोनों प्रचलित श्लोक इसी स्तोत्र के अंश हैं।

सुगम ज्ञान संगम के अध्यात्म + स्तोत्र संग्रह स्तम्भ (Category) में यह राम रक्षा स्तोत्र मूलपाठ प्रस्तुत है। स्तोत्र के अन्त में राम रक्षा स्तोत्र pdf उपलब्ध है।

❀ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (मूलपाठ) ❀

ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप्छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान् कीलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः।

अथ ध्यानम्
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्।।

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।।१।।

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्।।२।।

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।।३।।

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।।४।।

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः।।५।।

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः।।६।।

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।।७।।

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्।।८।।

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः।।९।।

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।।१०।।

पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुपमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।११।

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।१२।।

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।।१३।।

वज्रपञ्चरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।।१४।।

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः।।१५।।

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः।।१६।।

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।।१७।।

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।।१८।।

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ।।१९।।

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत:पथि सदैव गच्छताम्।।२०।।

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः।।२१।।

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः।।२२।।

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः।।२३।।

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः।।२४।।

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः।।२५।।

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्।
राजेन्द्रं सत्य सन्धं दशरथ तनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघु कुल तिलकं राघवं रावणारिम्।।२६।।

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।।२७।।

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम।।२८।।

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये।।२९।।

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने।।३०।।

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्।।३१।।

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये।।३२।।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।३३।।

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्।।३४।।

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।३५।।

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्।।३६।।

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर।।३७।।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।३८।।

।।इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

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