श्री राम स्तुति अर्थ

श्री राम स्तुति अर्थ सहित

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरणभवभयदारुणं।
भगवान श्रीराम की यह स्तुति हरिगीतिका छन्द के आधार पर सन्तकवि तुलसीदास द्वारा लिखी गयी है। जिसका वर्णन उन्होंने विनयपत्रिका में किया है। भगवान श्रीराम की स्तुति करने का यह सबसे सरल माध्यम है। हनुमानजी की प्रसन्न करना हो तो उनके इष्ट भगवान श्रीराम का गुणगान करना चाहिये, इसलिये यह स्तुति गाने पर प्रभु राम के संग हनुमानजी का भी आशीर्वाद मिलता है।
तो आइये,
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सुगम ज्ञान संगम के अध्यात्म + स्तोत्र संग्रह स्तम्भ में इसका पाठ करते हुए अर्थ जानें।

❀ श्रीराम स्तुति ❀

(❑➧मूलपाठअर्थसहित)

❑➧श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं। नवकंजलोचन, कंजमुख करकंज पदकंजारुणं।।१।।
❑अर्थ➠ हे मन! कृपालु श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर। वे संसार के जन्म-मरणरूपी दारुण भय को दूर करनेवाले हैं। उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान हैं। मुख-हाथ और चरण भी लाल कमल के समान हैं।

❑➧कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनकसुतावरं।।२।।
❑अर्थ➠ उनके सौन्दर्य की छटा अगणित कामदेवों से बढ़कर है। उनके शरीर का वर्ण (रंग) नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर है। पीताम्बर मेघरूप शरीर मानो बिजली के समान चमक रहा है, ऐसे पावनरूप जानकीपति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।।२।।

❑➧भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्दकन्द कोशलचन्द दशरथनन्दनं।।३।।
❑अर्थ➠ हे मन! दीनों के बन्धु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले, आनन्दकन्द कोशल-देशरूपी आकाश में निर्मल चन्द्रमा के समान दशरथनन्दन श्रीराम का भजन कर।।३।।

❑➧सिर मुकुट कुण्डल तिलकचारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानुभुज सरचाप धर, सङ्ग्रामजित खरदूषणं।।४।।
❑अर्थ➠ जिनके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट, कानों में कुण्डल भाल पर तिलक, और प्रत्येक अंग मे सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं । जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं । जो धनुष-बाण लिये हुए हैं, जिन्होनें संग्राम में खर-दूषण को जीत लिया है।।४।।

❑➧इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं।।५।।
❑अर्थ➠ जो शिव, शेषनाग और मुनियों के मन को प्रसन्न करनेवाले और काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं का नाश करनेवाले हैं, तुलसीदास प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे हृदय कमल में सदा निवास करें।।५।।

❑➧मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर सावरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।।६।।
❑अर्थ➠ जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से सुन्दर साँवला वर (श्रीरामन्द्रजी) तुमको मिलेगा। वह जो दया का खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है।।६।।

❑➧एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हिय हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली।।
❑अर्थ➠ इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखियाँ हृदय में हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं, भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं।।७।।

❑➧जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे।।
❑अर्थ➠ गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदय में जो हर्ष हुआ वह कहा नही जा सकता। सुन्दर मंगलों के मूल उनके बाँये अंग फड़कने लगे।

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