सच्चे संत की परख

सच्चे संत की परख

कबीरवाणी

(कबीर के दोहे)

समाज में तरह-तरह के लोग हैं। कुछ लोग पाखण्डी ही होते हैं। कुछ लोग पाखण्डी बन जाते हैं।

भक्ति की राह पर जब इन्सान चलने लगता है तो समाज के लोग उसे पूजने लगते हैं। उस दशा में भक्त के भीतर यदि स्वयं को पुजवाने की वासना ने जन्म ले लिया तो वह भक्त भक्तिमार्ग से भटक सकता है। पाखण्डी हो सकता है।

पाखण्डी लोग स्वयं तो भटकते हैं, औरों को भी भटकाते हैं, किन्तु जो भक्त होता है, वह अपना भी उद्धार करता है और दूसरों का भी।

इस पोस्ट में कबीर साहेब के १६ दोहों के संकलन आपके लिये लाये हैं, जो १६ आने सच हैं। इन १६ दोहों में पाखण्डियों, सच्चे सन्त और सच्चे गृहस्थियों की पहचान बताई गयी है।

तो आइये, इन सोलह दोहों का भावार्थ जानते हैं,

❑➧ चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस।
ते मुक्ता कैसे चुगें, पड़े काल के फंस।।१।।
❑अर्थ➠ जो बगुले का आचरण करके हंस कहलाते हैं, वे ज्ञान-मोती कैसे चुगेंगे? वे तो कल्पनारूपी काल की फाँस में पड़े हैं।।१।।
(दोहे का भाव है)
बगुला भी सफ़ेद होता है और हंस भी सफ़ेद होता है, लेकिन दोनों के आचरण में बहुत अन्तर है। उसी प्रकार पाखण्डी और सच्चे सन्त दिखने एक जैसे हो सकते हैं, किन्तु दोनों में ज़मीन-आसमान का अन्तर होता है। पाखण्डी सन्तत्व का ढोंग करता है, इसलिये ज्ञान के पचाना तो दूर, वह कल्पनारूपी बन्धन से बँधकर रह जाता है।

❑➧ साधु भया तो क्या भया, माला पहिरी चार।
बाहर भेष बनाइया, भीतर भरी भंगार।।२।।
इस दोहे का भाव एकदम सरल और स्पष्ट है
❑अर्थ➠(गले-हाथ इत्यादि में) चार मालायें पहनकर साधु-वेष धारण कर लेने से कुछ नहीं होगा; क्योंकि बाहर से तो उत्तम वेष बना लेने पर भी भीतर (काम, क्रोध, लोभरूपी) भंगार तो भरा पड़ा है।।२।।

❑➧ मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग।
तासों तो कौवा भला, तन मन एकहि अंग।।३।।
❑अर्थ➠ जो बगुले के समान कपटी है। तन का उजला और मन का मैला है। उससे अच्छा तो कौआ है, जो तन मन दोनों से काला है (किसी को छलता तो नहीं)।।३।।

❑➧ बाना पहिरे सिंह का, चलै भेड़ की चाल।
बोली बोले सियार की, कुत्ता खावै फाल।।४।।
❑अर्थ➠ सिंह का चोला (खाल) पहनकर जो भेड़ की चाल चलता है और सियार की बोली बोलता है। उसे कुत्ता अवश्य ही फाड़कर खा जायेगा।।४।।

❑➧ तन को जोगी सब करे, मन को करै न कोय।
सहजै सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होय।।५।।‍
❑अर्थ➠ सब लोग शरीर के वेष बदलकर योगी बनते हैं, मन का योगी कोई विरला ही बन पाता है। यदि मन योगी हो जाय तो सहज ही कल्याण की सिद्धि हो जाये।।५।।

❑➧ फाली फूली गाडरी, ओढि सिंह की खाल।
साचौ सिंह जब आ मिले, गाडर कौन हवाल।।६।।
❑अर्थ➠ सिंह की खाल ओढ़कर अभिमान में फूली-फूली भेड़ी फिरती है, परन्तु उसे जब सच्चा सिंह आकर कहीं मिल जायगा, तो उसकी क्या दशा होगी?।।६।।
(दोहे का भाव)
भाव-साधु वेष पहनकर पाखण्डी फूले-फूले फिरते हैं, परन्तु वे सन्तों के मिल जाने पर दुम दबाकर भाग जाते हैं।

❑➧ भेष देख मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान।
बिना कसौटी होत नहि, कंचन की पहिचान।।७।।
❑अर्थ➠ केवल साधु-वेष देखकर भ्रम में मत पड़ो। उनसे ज्ञान की बातें पूछो। बिना कसौटी के सोने की परख नहीं होती।।७।।

❑➧ कवि तो कोटि कोटि हैं, सिर के मूड़े कोट।
मन के मूड़े देखि करि, ता सँग लीजै ओट।।८।।
❑अर्थ➠ कविता करनेवाले तो करोड़ों-करोड़ों हैं और सिर मुड़ाकर घूमनेवाले भी करोड़ों हैं, परन्तु जिसने अपने मन को मूड़ा लिया है, ऐसे विवेकी (सन्तजनों) की शरण लो।।८।।

❑➧ जौ मानुष गृह धर्म युत, राखे शील विचार।
गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच सेवा सार।।९।।
❑अर्थ➠ जो मनुष्य गृहस्थी धर्म के युक्त रहता है, शील विचार रखता, गुरु के मुख से निकले वचनों का मनन करता है, साधु संग करता और मन, वचन, कर्म से सेवा करता है, उसी को जीवन का सार (लाभ) मिलता है।।९।।

❑➧ गिरही सेवै साधु को, भाव भक्ति आनन्द।
कहै कबीर बैरागी को, निरबानी निरदुन्द।।१०।।
❑अर्थ➠ गृहस्थ का धर्म है कि साधु की सेवा करे, सदैव प्रेम भक्ति में आनन्द-मग्न रहे। कबीर साहेब कहते हैं कि विरक्त संत का धर्म है कि वह विवाद रहित एवं हर्ष-शोक से रहित निर्द्वन्द्व रहे।।१०।।

❑➧ शब्द बिचारे पथ चलै, ज्ञान गली दे पाँव।
क्या रमता क्या बैठता, क्या गृह कंदला छाँव।।११।।
❑अर्थ➠ जो शब्दों का विचार करके ज्ञान मार्ग में पाँव रखकर राह चलता है, वह चाहे रमता रहे, चाहे बैठा रहे, चाहे आश्रम में रहे, चाहे गिरि-कन्दरा में रहे, चाहे वृक्ष की छाया में रहे, उसका कल्याण हो ही जाता है।।११।।

❑➧ बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम।
मद माया और इस्तरी, नहि सन्तन के काम।।१२।।
❑अर्थ➠ बोली, ठिठोली, मस्खरी, हँसी, खेल, मद, माया एवं स्त्री-संगत ये सन्तों को त्याग देना चाहिये।।१२।।

❑➧ बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।
दोऊ चूकि खाली पड़े, ताको वार न पार।।१३।।
❑अर्थ➠ साधु में विरक्तता और गृहस्थ में उदारतापूर्वक सेवा उत्तम है। यदि दोनों अपने-अपने गुणों से चूक गये तो वे रीते ही रह जाते हैं, फिर दोनों का उद्धार नहीं है।।१४।।

❑➧ घर में रहे तो भक्ति करु, नातरु करु बैराग।
बैरागी बन्धन करे, ताका बड़ा अभाग।।१५।।
❑अर्थ➠ घर में रहें तो भक्ति करनी चाहिए, अन्यथा घर त्यागकर वैराग्य करना चाहिए। जो विरक्त (वैरागी) होकर फिर से बन्धन में पड़ जाता है तो उसका महान दुर्भाग्य है।

❑➧ धारा तो दोनों भली, गिरही के बैराग।
गिरही दासातन करे, बैरागी अनुराग।।१६।।
❑अर्थ➠ धारा तो दोनों अच्छी है, क्या गृहस्थी? क्या वैराग्याश्रम? गृहस्थ को सन्तों की सेवा करनी चाहिए और विरक्त को वैराग्यनिष्ठ होना चाहिए।।१६।।

 

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