Category: स्तोत्र-संग्रह

अपराजिता स्तोत्र

अपराजित स्तोत्र ॐ नमोऽपराजितायै ॐ अस्या वैष्णव्याः पराया अजिताया महाविद्यायाः वामदेवबृहस्पतिमार्कण्डेया ऋषयः। गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती छन्दांसि। लक्ष्मीनृसिंहो देवता। ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं बीजम्। हुं शक्तिः। सकलकामनासिद्धयर्थं अपराजितविद्यामन्त्रेपाठे विनियोगः। ॐ निलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणान्विताम्। शुद्धस्फटिकसङ्काशां …

श्रीलक्ष्मीस्तोत्रम्-विष्णुपुराण

श्रीलक्ष्मीस्तोत्रम्-विष्णुपुराण श्रीलक्ष्मीस्तोत्रम् विष्णुमहापुराण में इन्द्र के द्वारा माता लक्ष्मी की स्तुति की गयी है, जो बहुत ही प्रभावशाली है। इस पोस्ट में श्रीलक्ष्मीस्तोत्रम् को मूल ❑➧श्लोकों लघु❍शब्दों में रूपान्तरित …

श्रीसूक्तम् मूल-लघु पाठ

श्रीसूक्तम् मूल-लघु पाठ देवी पूजा में श्रीसूक्त का विशेष स्थान है। भगवती लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये इसका पाठ सर्वोत्तम साधन माना जाता है। ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि की कामना …

बिल्वाष्टकम्

शिवपूजा में बेलपत्र का विशेष महत्त्व है। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पण करते समय बिल्वाष्टकम् स्तोत्र का पठन करने से मन अहोभाव से भर जाता है। लिंगाष्टकम् की तरह यह …

अथर्वशीर्ष क्या है?

अथर्वशीर्ष का अर्थ होता है, अथर्ववेद का शिरोभाग। वेद के चार भाग है, १)संहिता, २)ब्राह्मण, ३)आरण्यक तथा ४)उपनिषद्। जिन्हें श्रुति कहा जाता है। पाँच अथर्वशीर्ष हैं─ गणपत्यथर्वशीर्षम्, शिवाथर्वशीर्षम्, देव्यथर्वशीर्षम्, …

नारायण अथर्वशीर्ष अर्थ

सनातन पुरुष भगवान नारायण ने संकल्प किया⼀'मैं जीवों की सृष्टि करूँ।' (अत: उन्हीं से सबकी उत्पत्ति हुई है।) नारायण से ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न होता है, उन्हीं से मन …

नारायण अथर्वशीर्ष

पाँचों अथर्वशीर्ष में सबसे संक्षिप्त और सरल है। इसकी फलश्रुति में बताया गया है कि इसके पाठ से चारों वेदों के पाठ का फल प्राप्त होता है। मनुष्य सभी …

शिव अथर्वशीर्ष अर्थ‍

शिव अथर्वशीर्ष अर्थ‍ शिवाथर्वशीर्षम् पाँच अथर्वशीर्ष में सबसे बड़ा है। शिव उपासना में इसका विशेष महत्त्व है। इसमें बड़े-बड़े कुल सात अनुच्छेद है। आइये,https://sugamgyaansangam.com के इस पोस्ट में इसका …

देवी अथर्वशीर्ष अर्थ

सभी देवता देवी के समीप गये और नम्रता से पूछने लगे, हे महादेवि! तुम कौन हो? देवी ने कहा⸺मैं ब्रह्मस्वरूपा हूँ। मुझसे प्रकृति-पुरुषात्मक सद्रूप और असद्रूप जगत् उत्पन्न हुआ …

शिव स्तुति

श्रीस्कन्दमहापुराण के कुमारिकाखण्ड में स्कन्द द्वारा की गयी यह शिवस्तुति है, जिसका प्रवाह शिवपंचाक्षरी स्तोत्र की तरह है। इसकी फलश्रुति में स्वयं भगवान् शिव ने कहा है, जो लोग …