GOPI GEET

GOPI GEET

गोपी गीत
(हिन्दी अर्थ सहित)

गोप्य ऊचुः
❑➧जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते।।१।।
❍ जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः
श्रयत इन्दिरा शश्व दत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्-
त्वयि धृतासवस्-त्वां विचिन्वते।।१।।
(हे प्रियतम! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ़ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी हैं। इस व्रज की सेवा करने लगी हैं। परन्तु हे प्रियतम! देखो, तुम्हारी गोपियाँ, जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं, वन-वन भटककर तुम्हें ढूँढ़ रही हैं।।१।।

❑➧शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः।।२।।
❍ शरदु दाशये साधु-जातसत्-
सरसिजोदर-श्री-मुषा दृशा।
सुरत-नाथ ते ऽशुल्क-दासिका
वरद निघ्नतो नेह किं वधः।।२।।
(हमारे प्रेम पूर्ण हृदय के स्वामी! हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं। तुम शरदऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौन्दर्य को चुरानेवाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो। हमारे मनोरथ पूर्ण करनेवाले प्राणेश्वर! क्या नेत्रों से मारना वध नहीं है? अस्त्रों से हत्या करना ही वध है?।।२।।

❑➧विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात्।
वृषमयात्मजाद्विश्वतोभयाद्वृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः।।३।।
❍ विष-जलाप्य-याद्-व्याल-राक्षसाद्-
वर्ष-मारुताद्-वैद्युता-नलात्।
वृष-मयात्म-जाद्-विश्वतो-भयाद्-
वृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः।।३।।
(हे पुरुष शिरोमणि! यमुनाजी के विषैले जल से होनेवाली मृत्यु , अजगर के रूप में खानेवाली मृत्यु अघासुर, इन्द्र की वर्षा, आँधी, बिजली, दावानल, वृषभासुर और व्योमासुर आदि से भिन्न-भिन्न समय पर सब प्रकार के भयों से तुमने बार-बार हम लोगों की रक्षा की है।।३।।

❑➧न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले।।४।।
❍ न खलु गोपिका-नन्दनो भवा-
नखिल-देहिना-मन्तरात्म-दृक्।
विखन-सार्थितो विश्व-गुप्तये
सख उदेयिवान्-सात्वतां कुले।।४।।
(हे परम सखा! तुम केवल यशोदा के ही पुत्र नहीं हो, अपितु समस्त शरीरधारियों के हृदय में रहनेवाले साक्षी-अन्तर्यामी हो। ब्रह्माजी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए तुम यदुवंश में अवतीर्ण हुए हो।।४।।)

❑➧विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्।।५।।
❍ विरचिता-भयं वृष्णि-धुर्य ते
चरण-मीयुषां संसृतेर्-भयात्।
कर-सरोरुहं कान्त कामदं
शिरसि धेहि नः श्री-कर-ग्रहम्।।५।।
(हे यदुवंश शिरोमणि! तुम अपने प्रेमियों की अभिलाषा पूर्ण करनेवालों में सबसे आगे हो। जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे करकमल अपनी छत्र छाया में लेकर निर्भय कर देते हैं। हमारे प्रियतम! सबकी लालसा-अभिलाषाओं को पूर्ण करनेवाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकड़ा है, हमारे शीश पर रख दो।।५।।)

❑➧व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित।
भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय।।६।।
❍ व्रज-जनार्ति-हन्-वीर योषितां
निज-जनस्मय-ध्वंस-नस्मित।
भज सखे भवत्-किङ्करीः स्म नो
जलरुहा-ननं चारु दर्शय।।६।।
(हे वीर शिरोमणि श्यामसुन्दर! तुम सभी व्रजवासियों का दुःख दूर करनेवाले हो। तुम्हारी मन्द-मन्द मुस्कान की एक-एक झलक ही तुम्हारे प्रेमीजनों के सारे मान-मद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त हैं। हमारे प्यारे सखा! हमसे रूठो मत, प्रेम करो। हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर न्योछावर हैं। हम अबलाओं को अपना वह परम सुन्दर साँवला मुखकमल दिखलाओ।।६।।)

❑➧प्रणतदेहिनां पापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम्।
फणिफणार्पितं ते पदाम्बुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्।।७।।
❍ प्रणत-देहिनां पाप-कर्शनं
तृण-चरानुगं श्री-निकेतनम्।
फणि-फणार्पितं ते पदाम्बुजं
कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्।।७।।
(तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं। वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्य की खान हैं और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती रहती हैं। तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो और हमारे लिए उन्हें साँप के फणों तक पर रखने में भी तुमने संकोच नहीं किया। हमारा हृदय तुम्हारी विरह-व्यथा की आग से जल रहा है। तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमें सता रही है। तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष-स्थल पर रखकर हमारे हृदय की ज्वाला शान्त कर दो।।७।।)

❑➧मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण।
विधिकरीरिमा वीर मुह्यतीरधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः।।८।।
❍ मधुरया गिरा वल्गु-वाक्यया
बुध-मनोज्ञया पुष्करे-क्षण।
विधि-करीरिमा वीर मुह्यती-
रध-रसीधुनाऽऽ-प्याय-यस्व नः।।८।।
(हे कमलनयन! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है। तुम्हारा एक-एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढ़कर मधुर है। बड़े-बड़े विद्वान उसमे रम जाते हैं । उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं। हे दानवीर! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवनदान देकर तृप्त कर दो।।८।।)

❑➧तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः।।९।।
❍ तव कथामृतं तप्त-जीवनं
कवि-भिरीडितं कल्मषा-पहम्।
श्रवण-मङ्गलं श्री-मदा-ततं
भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः।।९।।
(हे प्रभो! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत स्वरूप है। विरह से सताए हुये लोगों के लिए तो वह सर्वस्व जीवन ही है। बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं, भक्तकवियों ने उसका गान किया है। वह सारे पाप-ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मंगल परम कल्याण का दान भी करती है। वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है। जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में भू-लोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं।।९।।)

❑➧प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम्।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि।।१०।।
❍ प्रहसितं प्रिय प्रेम-वीक्षणं
विहरणं च ते ध्यान-मङ्गलम्।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः
कुहक नो मनः क्षोभ-यन्ति हि।।१०।।
(हे प्यारे ! एक दिन वह था, जब तुम्हारे प्रेम भरी हँसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह तरह की क्रीडाओं का ध्यान करके हम आनन्दमग्न हो जाया करती थीं। उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है, उसके बाद तुम मिले। तुमने एकान्त में हृदय-स्पर्शी ठिठोलियाँ की, प्रेम की बातें कहीं। हे छलिया! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर देती हैं।।१०।।)

❑➧चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति।।११।।
❍ चलसि यद्-व्रजाच्-चारयन्-पशून्
नलिन-सुन्दरं नाथ ते पदम्।
शिल-तृणाङ्कुरैः सीदतीति नः
कलिलतां मनः कान्त गच्छति।।११।।
(हे हमारे प्यारे स्वामी! हे प्रियतम! तुम्हारे चरण कमल से भी सुकोमल और सुन्दर हैं। जब तुम गौओं को चराने के लिये व्रज से निकलते हो, तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके, कुश एवं काँटे चुभ जाने से कष्ट पाते होंगे; हमारा मन बेचैन हो जाता है। हमें बड़ा दुःख होता है।।११।।)

❑➧दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि।।१२।।
❍ दिन-परिक्षये नील-कुन्तलैर्
वन-रुहाननं बिभ्रदा-वृतम्।
घन-रज-स्वलं दर्शयन्-मुहुर्
मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि।।१२।।
(हे हमारे वीर प्रियतम! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं कि तुम्हारे मुखकमल पर नीली-नीली अलकें लटक रही हैं और गौओं के खुर से उड़-उड़कर घनी धूल पड़ी हुई है। तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखा दिखाकर हमारे हृदय में मिलन की आकांक्षा उत्पन्न करते हो।।१२।।)

❑➧प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि।
चरणपङ्कजं शन्तमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन्।।१३।।
❍ प्रणत-कामदं पद्म-जार्चितं
धरणि-मण्डनं ध्येय-मापदि।
चरण-पङ्कजं शन्तमं च ते
रमण नः स्तनेष्-वर्पया-धिहन्।।१३।।
(हे प्रियतम! एकमात्र तुम्हीं हमारे सारे दुःखों को मिटानेवाले हो। तुम्हारे चरणकमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करनेवाले हैं । स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती हैं और पृथ्वी के तो वे भूषण ही हैं। आपत्ति के समय एकमात्र उन्हीं का चिन्तन करना उचित है, जिससे सारी आपत्तियाँ कट जाती हैं। हे कुंजबिहारी! तुम अपने उन परम कल्याण स्वरूप चरण हमारे वक्षस्थल पर रखकर हमारे हृदय की व्यथा शान्त कर दो।।१३।।)

❑➧सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्।।१४।।
❍ सुरत-वर्धनं शोक-नाशनं
स्वरित-वेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतर-रागवि-स्मारणं नृणां
वितर वीर नस्-तेऽधरामृतम्।।१४।।
(हे वीर शिरोमणि! तुम्हारा अधरामृत मिलन के सुख को को बढ़ानेवाला है। वह विरहजन्य समस्त शोक सन्ताप को नष्ट कर देता है। यह गानेवाली बाँसुरी भलीभाँति उसे चूमती रहती है। जिन्होंने उसे एक बार पी लिया, उन लोगों को फिर अन्य सारी आसक्तियों का स्मरण भी नहीं होता। अपना वही अधरामृत हमें पिलाओ।।१४।।)

❑➧अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्।।१५।।
❍ अटति यद्-भवा-नह्नि काननं
त्रुटिर्-युगायते त्वाम-पश्यताम्।
कुटिल-कुन्तलं श्री-मुखं च ते
जड उदीक्षतां पक्ष्म-कृद्-दृशाम्।।१५।।
(हे प्यारे! दिन के समय जब तुम वन में विहार करने के लिए चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिए एक-एक क्षण युग के समान हो जाता है और जब तुम सन्ध्या के समय लौटते हो, तब घुँघराले बालों से युक्त तुम्हारा परम सुन्दर मुखारविन्द हम देखती हैं, उस समय पलकों का गिरना भी हमारे लिए अत्यन्त कष्टकारी हो जाता है और ऐसा जान पड़ता है कि इन पलकों को बनानेवाला विधाता मूर्ख है।।१५।।)

❑➧पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि।।१६।।
❍ पति-सुतान्वय-भ्रातृ-बान्धवा-
नति-विलङ्घ्य ते ऽन्त्यच्युता-गताः।
गति-विदस्त-वोद्-गीत-मोहिताः
कितव योषितः कस्त्य-जेन्निशि।।१६।।
(हे श्याम सुन्दर! हम अपने पति-पुत्र, भाई -बन्धु, और कुल परिवार का त्यागकर, उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं। हम तुम्हारी हर चाल को जानती हैं, हर संकेत समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आयी हैं। हे कपटी! इस प्रकार रात्रि के समय आयी हुई युवतियों को तुम्हारे सिवा और कौन छेड़ सकता है?।।१६।।)

❑➧रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः।।१७।।
❍ रहसि संविदं हृच्छयोदयं
प्रहसि-ताननं प्रेम-वीक्षणम्।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते
मुहु-रति-स्पृहा मुह्यते मनः।।१७।।
(हे प्यारे! एकान्त में तुम मिलन की इच्छा और प्रेम-भाव जगानेवाली बातें किया करते थे। ठिठोली करके हमें छेड़ते थे। तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखकर मुस्कुरा देते थे और हम तुम्हारा वह विशाल वक्ष:स्थल देखती थीं, जिस पर लक्ष्मीजी नित्य निरन्तर निवास करती हैं। हे प्रिये! तबसे अब तक निरन्तर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यन्त आसक्त होता जा रहा है।।१७।।)

❑➧व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्।।१८।।
❍ व्रज-वनौ-कसां व्यक्ति-रङ्ग ते
वृजिन-हन्त्र्यलं विश्व-मङ्गलम्।
त्यज मनाक् च नस्त्स्पृहात्मनां
(स्वजन-हृद्रुजां यन्-निषूदनम्।।१८।।
हे प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख ताप को नष्ट करनेवाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है। हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है। कुछ थोड़ी-सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निजजनो के हृदय-रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।।१८।।)

❑➧यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः।।१९।।
❍ यत्ते सुजात-चरणाम्बु-रुहं स्तनेष
भीताः शनैः प्रिय दधी-महि कर्कशेषु।
तेना-टवी-मटसि तद्व्यथते न किंस्वित्
कूर्पादिभिर्-भ्रमति धीर्भ वदायुषां नः।।१९।।
(हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे चरण कमल से भी कोमल हैं। उन्हें हम अपने कठोर स्तनों पर भी डरते-डरते रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाये। उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे-छिपे भटक रहे हो। क्या कण्कड़, पत्थर, काँटे आदि की चोट लगने से उनमें पीड़ा नहीं होती? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही मूर्छा आ रही है। हम अचेत होती जा रही हैं। हे प्यारे श्यामसुन्दर! हे प्राणनाथ! हमारा जीवन तुम्हारे लिए है, हम तुम्हारे लिए जी रही हैं, हम केवल तुम्हारी हैं।।१९।।)

।।इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडायां गोपीगीतं नामैकत्रिंशोऽध्यायः।।

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