RAM RAKSHA STOTRAM

RAM RAKSHA STOTRAM

ध्यान दें:- इस स्तोत्र में मूल श्लोक गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित किताब स्तोत्र रत्नावली से लिया गया है। मूल श्लोक के बाद उन्हीं श्लोकों के शब्दों को केवल छोटे-छोटे रूप में दर्शाया गया है, जिसे देखकर पाठकगण सरलतापूर्वक स्तोत्र पढ़ सकें। ❍ इस चिह्न के बाद श्लोकों के शब्द छोटे शब्द दर्शाये गये हैं। यह शब्दों का सन्धि-विच्छेदन नहीं है; क्योंकि सन्धि-विच्छेदन से मूल उच्चारण में अन्तर पड़ जाता है, अतः केवल उच्चारण की दृष्टि से शब्दों को छोटे रूप में दर्शाया गया है।

श्रीरामरक्षास्तोत्रम्

❑➧ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप्छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान् कीलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः।
❍ ॐ अस्य श्रीराम रक्षा स्तोत्र मन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीता रामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान् कीलकं श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे रामरक्षा स्तोत्र जपे विनियोगः।
❑अर्थ➠ इस रामरक्षा स्तोत्र-मंत्र के बुधकौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचन्द्र देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है, सीता शक्ति हैं, श्रीमान हनुमान जी कीलक हैं तथा श्रीरामचन्द्र जी की प्रसन्नता के लिये रामरक्षास्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता है।

अथ ध्यानम्
❑➧ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्।।
❍ ध्याये दाजानु बाहुं धृत शर धनुषं बद्ध पद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नव कमल दल स्पर्धि नेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढ सीता मुखकमल मिलल् लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कार दीप्तं दधत मुरु जटा मण्डलं रामचन्द्रम्।।
❑अर्थ➠ जो धनुष बाण धारण किये हुए हैं, बद्ध पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीताम्बर पहने हुए हैं। जिनके नेत्र नूतन कमलदलों से स्पर्धा करते तथा बायें भाग में विराजमान सीताजी के मुखकमल से मिले हुए हैं। उन अाजानबाहु, मेघश्याम, विभिन्न अलंकारों से विभूषित जटाजूटधारी श्रीराम का ध्यान करें।

❑➧चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।।१।।
❍ चरितं रघु नाथस्य
शत कोटि प्रविस्तरम्।
एकै कमक्षरं पुंसां
महा पातक नाशनम्।।१।।

❑➧ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्।।२।।
❍ ध्यात्वा नीलोत् पल श्यामं
रामं राजीव लोचनम्।
जानकी लक्ष्मणो पेतं
जटा मुकुट मण्डितम्।।२।।

❑➧सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।।३।।
❍ सासितूण धनुर्बाण-
पाणिं नक्तं चरान्तकम्।
स्व-लीलया जगत् त्रातु-
माविर्भूत मजं विभुम्।।३।।

❑➧रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।।४।।
❍ राम रक्षां पठेत् प्राज्ञः
पापघ्नीं सर्व कामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु
भालं दशरथात्मजः।।४।।

❑➧कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः।।५।।
❍ कौसल्येयो दृशौ पातु
विश्वा मित्र प्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मख त्राता
मुखं सौमित्रि वत्सलः।।५।।

❑➧जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः।।६।।
❍ जिह्वां विद्या निधिः पातु
कण्ठं भरत वन्दितः।
स्कन्धौ दिव्या युधः पातु
भुजौ भग्नेश कार्मुकः।।६।।

❑➧करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।।७।।
❍ करौ सीता पतिः पातु
हृदयं जाम दग्न्य जित्।
मध्यं पातु खर ध्वंसी
नाभिं जाम्ब वदाश्रयः।।७।।

❑➧सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्।।८।।
❍ सुग्रीवेशः कटी पातु
सक्थिनी हनुमत् प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु
रक्षः कुल विनाश कृत्।।८।।

❑➧जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः।।९।।
❍ जानुनी सेतु कृत्पातु
जङ्घे दश मुखान्तकः।
पादौ विभीषण श्रीदः
पातु रामो ऽखिलं वपुः।।९।।

❑➧एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।।१०।।
❍ एतां राम बलो पेतां
रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री
विजयी विनयी भवेत्।।१०।।

❑➧पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुपमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।११।
❍ पाताल भूतल व्योम
चारिणश् छद्म चारिणः।
न द्रष्टुप मपि शक्तास्ते
रक्षितं राम नामभिः।।११।।

❑➧रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।१२।।
❍ रामेति राम भद्रेति
राम चन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्
भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।१२।।

❑➧जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।।१३।।
❍ जगज् जैत्रैक मन्त्रेण
राम नाम्नाभि रक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत् तस्य
करस्थाः सर्व सिद्धयः।।१३।।

❑➧वज्रपञ्चरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।।१४।।
❍ वज्र पञ्चरना मेदं
यो राम कवचं स्मरेत्।
अव्याह ताज्ञः सर्वत्र
लभते जय मङ्गलम्।।१४।।

❑➧आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः।।१५।।
❍ आदिष्ट वान्यथा स्वप्ने
राम रक्षा मिमां हरः।
तथा लिखित वान्प्रातः
प्रबुद्धो बुध कौशिकः।।१५।।

❑➧आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः।।१६।।
❍ आरामः कल्प वृक्षाणां
विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस् त्रिलोकानां
रामः श्रीमान् स नः प्रभुः।।१६।।

❑➧तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।।१७।।
❍ तरुणौ रूप सम्पन्नौ
सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीक विशालाक्षौ
चीर कृष्णा जिनाम्बरौ।।१७।।

❑➧फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।।१८।।
❍ फल मूला शिनौ दान्तौ
तापसौ ब्रह्म चारिणौ।
पुत्रौ दशरथ स्यैतौ
भ्रातरौ राम लक्ष्मणौ।।१८।।

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